महानता दरअसल एक illusionary सर्किल है, एक VIP घेरा है, काल्पनिक।

हाल ही एक फिल्म देखी थी Never Been Kissed, उसमें एक लङकी है कॉलेज में चश्मिस पढाकू टाईप। उसको शौक होता है कि उसे भी कूल बनना है। कूल यानी आप समझते ही होंगे, जो क्लास में अट्रेक्टिव लोग होते हैं स्टाइलिश, टशनबाज। जो बकैती भी करते हैं तो क्लास करती है वाह यार वाह। जिनके सड़े गले जोक्स पर भी पूरी क्लास हंसती है।
तो वो लङकी अपने भाई (जो कि अपने टाईम में कूल रह चुका है) से टिप्स लेने के लिए पूछती है कि मैं कूल कैसे बनूं?
तो उसका भाई एक बहुत ही ज्ञान की बात कहता है- कि तुझे कूल लोगों के ग्रुप में शामिल होना है तो तुझे उस ग्रुप में से किसी एक कूल बंदे की अप्रूवल चाहिए होगी। अर्थात अगर तेरी किसी भी एक हरकत/बकलोली को एक कूल बंदे ने वाह वाह कर दिया ना तो पूरा कूल सर्किल तुझे असेप्ट कर लेगा। फिर उसके बाद चाहे तू कुछ भी हरकत करना, वो कूल होगी। कूलता ऐसे ही वर्क करती है।
फिर उसका भाई फर्जी तौर पर उस कॉलेज में एडमिशन लेता है और लङकी की एकाध बकलोल हरकत पर वाह वाह करके उस को कूल घोषित कर देता है तो पूरा कूल ग्रुप उसे असेप्ट कर लेता है। और वो धीरे धीरे उस ग्रुप की लीडर बन जाती है।

तो महानता का भी ऐसा ही सीन है, जो कूलता का है। मतलब ना तो महानता परिभाषित है और ना ही कूलता। होता यह है कि एक नया आदमी आता है, उसे दूसरा ऑलरेडी कथित महान आदमी अपने स्वार्थ से या कैसे भी महान कह देता है तो वो भी उस महान लोगों के सर्किल में शामिल हो जाता है। फिर उसमें भी महानता की पावर आ जाती है। फिर वो भी आगे अपने स्वार्थ के हिसाब से महानता के ब्ल्यू टिक देता रहता है और नये लोगों को महान घोषित करता रहता है। सदियों से महानता इसी तरह स्थापित है, जैसे कॉलेजों में कूलता स्थापित है। पुराने लोग निकलते रहते हैं नये लोग ब्लू टिक पाकर घुसते रहते हैं। यहां तक कि अब इन ब्ल्यू टिक्स को ऑफिशियल रूप दे कर नोबल, बुकर, ऑस्कर की ट्रॉफियों में ढाल दिया गया है। जिसको भी महानता का ब्लू टिक प्रदान करना होता है उसे नोबल/ऑस्कर/बुकर दे दिया जाता है। सैम अंकल को पाकिस्तान में अपना एक “महान” प्रवक्ता स्थापित करना है, लो मलाला युसुफजई तुम नोबल ले लो। डील डन। अपने को भारत में अपनी एक “महान” गोटी सेट करनी है, लो अरूणधति रॉय तुम बुकर प्राईज ले लो, अब तुम जो कुछ भी बकोगी वो न्यूज की हेडलाईन बना करेगी, क्योंकि तुम्हें ब्लू टिक “बुकर” मिल चुका है।


इस प्रकार कुल मिलाकर महानता दरअसल एक नेक्सस है। टैगोर ने गांधी को ब्लू टिक दिया, बदले में गांधी ने टेगौर को दे दिया। अब किसी से पूछो कि गांधी महान क्यों है? जवाब मिलेगा कि उसे गुरुदेव टेगौर ने महात्मा कहा था। और टेगौर महान क्यों है? क्योंकि टेगौर को महात्मा गांधी ने गुरुदेव कहा था। तू मेरी खुजा, मैं तेरी खुजाता हुं। गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत आने से पहले ही “महान” होने का ब्लू टिक प्राप्त कर चुका था, बिना भारत के लिए एक भी काम किए। महादेव गोविंद रानाडे ने गोपाल कृष्ण गोखले को वेरिफाई किया, गोखले ने गांधी को ब्लू टिक दिया, गांधी ने आगे नेहरू को महान घोषित कर दिया, नेहरू ने आगे वो ब्लू टिक विजयलक्ष्मी पंडित, इंदिरा आदि को सौंप दिया..


गौर कीजिए कि लगभग महान लोग आपस में किसी ना किसी रिश्ते से जुङे हुए हैं, कोई किसी की बहन है, कोई किसी का साला है, कोई किसी का बेटा है। महानता कुछ लोगों की बपौती है, जैसे कि बॉलीवुड है। यहां तक कि अपने यहां तो एक परिवार की सारी पीढियाँ ही निरंतर महान पैदा होती जा रही हैं। महानता उस परिवार के खून में इस प्रकार बह निकली है कि रोके नहीं रुक रही है।


ओशो को आजतक ब्लू टिक नहीं मिला इंडिया में। क्यों? क्योंकि ओशो ने किसी की खुजाई नहीं, तो ओशो की भी किसी ने खुजाई नहीं। ओशो उस महानता के सर्किल के अंदर वालों से ब्लू टिक ना प्राप्त कर सका इसलिए ओशो आज भी महान घोषित नहीं है भारत में।

कोई महान वहान नहीं है, सब मोहमाया है।

Written By – GhanShyam Singh Odint

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