लेखन
लिखना या फिल्म बनाना हंगने की तरह है। यानी कि जो आप खाते हैं, पूरे दिन पेट में इकट्ठा करते हैं, पचाते हैं यानी रिसाइकिल करते ह़ै, फिर दूसरे दिन सुबह जा कर हंगते हैं। तब जा कर आपको संतुष्टि का अहसास होता है। फिल्मकार भी ऐसा ही करता है, वो अपने आस पास या मीडिया द्वारा, सोशल मीडिया द्वारा, साहित्य द्वारा जो भी देखता है, उसे अपने दिमाग में इकट्ठा करता है, पचाता है, लगभग साल भर रिसाइकिल करता है फिर वक्त आने पर स्क्रीन पर जा कर हंगता है। तब जा कर उसे चैन मिलता है। यह पूर्णतया प्राकृतिक प्रकिया है।
आजकल समस्या यह होती है कि कई फिल्मकार खाए बिना हंगने की कोशिश करते हैं। वॉशरूम में (लेखन के लिए शिमला-गोवा वगैरह) जा कर जोर लगाते हैं लेकिन यह नहीं समझते कि यह खेल जोर का नहीं खुराक का है। पढने की खुराक नियमित लेने की आदत डालिए। निरंतर खाते रहेंगे तो निरंतर जाते रहेंगे, क्योंकि भोजन हो या विचार पचने के बाद अंदर नहीं थमते, रोके नहीं रुकते, बाहर आकर ही दम लेते हैं। लेकिन खाली पेट और खाली दिमाग कितना भी जोर लगाओ सब व्यर्थ ही है।
लेकिन आजकल अधिकतर फिल्मकारों को टाइम ही नहीं खाने के लिए, बस बार बार निरंतर हंगते जाने की जल्दी है। वो खाने की सलाह को दरकिनार करके विदेशीे दवाईयों (रीमेक) का सहारा लेते हैं और फिर साइड इफैक्टस्वरूप ‘तल्डा’ (दस्त) के शिकार होते हैं। बॉलीवुड में जो लिमिटेड टॉयलेट्स हैं वो बरसों से इन्हीं दस्त वालों के कब्जे में है, इसलिए जिनको वाकई में लग रही होती है उन्हें खुले में जाना पड़ता है।
कोई इन्हें समझाओ कि भई खाएगा इंडिया, तभी तो जाएगा इंडिया।।
(बीच बीच में फेसबुक पर उल्टी करते रहना भी जरुरी है ताकि हाजमा दुरुस्त रहे)
#ज्ञान_की_चोट

