भाजपा का नारी शक्ति वंदन

भाजपा का “नारी शक्ति वंदन” उतना ही सफल होगा जितना कांग्रेस का हालिया ‘नरेगा आंदोलन’ और ‘वोट चोरी’ वाला नैरेटिव हुआ था। गड़बड़ सारी डेटा की वजह से है, यहाँ फ़ैसले जिन सर्वे के बेसिस पर लिए जाते हैं वो सारे सर्वे ही फेक/पूर्वाग्रह जनित होते हैं।

दो साल पहले जब मध्यप्रदेश, छतीसगढ़, राजस्थान चुनाव में भाजपा की जीत हुई तो मीडिया में बैठे कथित राजनीतिक विश्लेषकों ने यह फतवा जारी किया कि मध्यप्रदेश की जीत ‘लाडली बहना योजना’ की वजह से हुई है। महिला फ़्रीबी योजनाओं की वजह से महिलाओं ने भाजपा को भारी वोटिंग की है। तो मैं सिर्फ़ यह पूछना चाहता हुँ कि भाई यह वोटिंग महिलाओं ने राजस्थान में क्यों नहीं की कांग्रेस को? गहलोत जी तो उनसे चार कदम आगे फ्री स्मार्टफोन वगैरह भी दे रहे थे?

पहली बात तो यह कि भारत में है गुप्त मताधिकार। यानी कि यह जानने का कोई तरीका नहीं है कि महिलाओं ने भाजपा को वोटिंग की है या नहीं, इसलिए स्टूडियो में बैठ कर कोई भी विश्लेषक बन कर कुछ भी कह सकता है। मीडिया जो कहता है वो नैरेटिव बन जाता है। आज आप किसी से भी पूछिए वो यही दोहराता मिलेगा कि महिलाओं की वोटिंग की वजह से भाजपा जीती है।

खैर यह तो हुआ नैरेटिव, वास्तविकता हम सब को पता है। इस देश में 99.99% महिलाएँ राजनीतिक रूप से इनएक्टिव होती हैं। उनको लोकसभा और विधानसभा का फ़र्क़ भी नहीं मालूम। उनको अपने घर की आपसी राजनीति से ही फुर्सत नहीं मिल पाती, इसलिए उनको लेना देना ही नहीं होता देश की राजनीति से। वो वोट वहीं देती हैं जहाँ उनके घरवाले कहते हैं। उनकी ख़ुद की कोई पॉलिटिकल ओपिनियन नहीं होती है। जैसे मैं आपसे पूछूँ कि बनारसी साड़ी और कांजीवरम साड़ी पर आपकी क्या राय है? जितना लोड (इंटरेस्ट) और नॉलेज आपको कांजीवरम साड़ी की है उतनी ही महिलाओं को भाजपा और कांग्रेस की है। पहले मुझे लगता था कि शायद यह हाल सिर्फ़ गांवों में ही होगा, लेकिन यही हाल शहरों में भी है।

तो सवाल यह है कि फिर ये बात आई कहाँ से? सारी फ़साद की जड़ है वो डेटा जिसको ग़लत इंटरप्रेट किया जा रहा है। डेटा यह है कि पिछले कुछ सालों में महिलाओं का वोटिंग परसेंटेज बढ़ा है। जिससे कथित राजनीतिक पंडितों को लगता है कि महिलाएँ अब राजनीति में सक्रिय हो रही हैं। नहीं ब्रो, फीमेल वोटिंग परसेंटेज बढ़ने का कारण है कि पुरुष और ज़्यादा सक्रिय हो रहे हैं इसलिए वो महिलाओं को अब वोट देने भेजने लगे हैं। इंटरनेट आने के बाद उन्हें देश खतरे में नजर आने लगा है, उनमें राजनीतिक कट्टरता बढ़ी है इसलिए वो जोर लगा कर महिलाओं को वोट देने “ला रहे” हैं। लेकिन अब भी वोट वो वहीं देती है जहां उनको बताया गया होता है।

अपने आसपास देखिए कितनी राजनीतिक समझ वाली महिलाएँ हैं? महिला राजनेता भी सिर्फ और सिर्फ़ वो हैं जो राजनीतिक परिवारों से आती हैं। दिव्या मदेरणा, सुशीला डूडी, प्रीति शक्तावत, प्रियंका चौधरी, प्रियंका गांधी, सोनिया गांधी आदि आदि। सिर्फ़ बाप, दादा या पति की विरासत संभाल रही हैं। विरासत के अलावा भी अन्य एकाध जो हैं वो भी इसलिए हैं कि पति सरकारी सेवा वगैरह में है इसलिए चुनाव लड़ नहीं सकते तो नाम पत्नी का चलता है कागजों में, विधायक/प्रधान/सरपंच पति ही होता है।

दूसरा, जब चुनाव होते हैं तो मीडिया वाले जा कर किसी भी महिला के मुँह में माइक ठूँसते हैं कि आप किसको वोट देंगी? वो कहती है कि फलां-फलां को दूंगी। पत्रकार पूछता है क्यों? वो कहती है कि क्योंकि फलां फलां जी ने हमारे गैस कनेक्शन दे दिया, गेंहू फ्री दे दिए, लाइट फ्री कर दी, हजार रुपये खाते में दे दिए वगैरह वगैरह। जाहिर सी बात है कि वो सिर्फ यही सब कह सकती है क्योंकि इसके अलावा उसे कुछ पता ही नहीं है देश दुनिया के बारे में। यह वो कह ज़रूर रही है लेकिन वोट देने की यह वजह बिल्कुल नहीं है। असलियत में तो उसको यह भी नहीं पता कि लाइट फ्री राज्य में बैठे फलां फलां जी ने की है या केंद्र में बैठे ब्लां-ब्लां जी ने की है। वोट वो वहीं दे रही है जहाँ उसको देना है, उसका फ्रीबीज से कोई ताल्लुक नहीं है, लेकिन चूंकि वो यह तो कह नहीं सकती कि घरवालों ने इसको ही वोट देने को कहा है इसलिए दे रही हूँ, तो वो यह सब ऊटपटाँग रटी-रटाई बातें कहती है।

मीडिया वाले जो कभी स्टूडियो से नहीं निकले उनको लगता है कि यह सच बोल रही है। और देश में नैरेटिव बन जाता है कि महिलाओं ने वोट दिया इसलिए भाजपा जीती है। महामानव जी को उनके पोलिटिकल एडवाइजर बोलते हैं कि चलो महिलाओं को लुभाया जाए और आरक्षण आरक्षण खेला जाए।

खेलो भाई.. महिलाओं को घंटा फर्क नहीं पड़ रहा आरक्षण से। कोई सोना-चाँदी सस्ती करने की बात चले तो उनको इंटरेस्ट भी आए। They don’t give a f**k about women reservation.

और महिला आरक्षण हमने पंचायतों में दे ही रखा है, कितनी महिला वास्तविक सरपंच बन गई आज तक?

तो प्रिय मोदीजी, कृपया उन पॉलिटिकल एडवाइजर्स को वापस कांग्रेस में भेज दीजिए जो आपको यह समझा रहे हैं कि फ्रीबीज की वजह से ही भाजपा जीत रही है। यह वैसा ही है जैसे कोई कहे कि इस साल बनारसी साड़ियां ज़्यादा बिकी हैं क्योंकि मर्दों के लिए 1% डिस्काउंट ऑफर चल रहा था। याद रखिए कि बनारसी साड़ियों के ज़्यादा बिकने के हज़ार कारण हो सकते हैं लेकिन यह तो कभी नहीं होगा कि 1% डिस्काउंट के लिए मर्द अपना काम खोटी करके, सेल की लाइन में 2 घंटे खड़े रह कर साड़ी ख़रीद रहे हैं इसलिए सेल बढ़ी है।

← All articles