चाणक्य का मंडल सिद्धांत

एक साधारण बालक को भारतीय इतिहास का सबसे प्रसिद्ध शासक चंद्रगुप्त मौर्य बनाने के सूत्रधार रहे आचार्य चाणक्य (कौटिल्य) की गिनती आज विश्व के सर्वकालिक महान राजनीतिज्ञों में होती है। इसकी बड़ी वजह यह है कि उनके विचार तथा नीतियां आज लगभग दो हजार साल बाद भी प्रासंगिक हैं। आज से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व उन्होंने बहुचर्चित ‘राज्य का मंडल सिद्धांत’ प्रतिपादित किया था जिसकी मैं वर्तमान परिप्रेक्ष्य के परिवार के संदर्भ में व्याख्या करने की गुस्ताखी कर रहा हुं।

आचार्य चाणक्य राज्य की उत्पत्ति का आधार ‘सामाजिक समझौते’ को मानते थे। वर्तमान समय में विवाह नामक सामाजिक समझौते के तहत मंडल (घर) के केंद्र में नई बहु के साम्राज्य की उत्पत्ति होती है जिसे आचार्य चाणक्य ने ‘विजीगीषु’ माना है। विजीगीषु का तात्पर्य है- वह राजा जो अपनी सत्ता (प्रभाव) का विस्तार करना चाहता है। विजीगीषु के चारों तरफ जो पड़ोसी राज्य (सास, ननद, देवरानी, जेठानी आदि) होते हैं उनके समूह को मंडल कहा गया है। आचार्य ने अपने मंडल सिद्धांत में बताया है कि ‘विजीगीषु’ के पड़ोसी राज्य स्वाभाविक रूप से उसके अरि (शत्रु) होते हैं क्योंकि पहले से स्थापित उन राज्यों को अपने निकट पनप रही नई सत्ता के मजबूत हो जाने पर खुद पर आक्रमण का भय रहता है। इस वजह से ‘विजीगीषु’ के सभी पड़ोसी राज्य अर्थात ननद, देवरानी, जेठानी उस विजीगीषु को स्वत: ही अपना अरि (शत्रु) मान बैठते हैं। परन्तु चूंकि ये सभी राज्य स्वयं की सत्ता को सर्वशक्तिमान बनाना चाहते हैं इसलिए ये विजीगीषु के अरि (शत्रु) होने के अलावा आपस में भी एक दूसरे के अरि (शत्रु) होते हैं। यहां उल्लेखनीय है कि मंडल में सर्वाधिक शक्तिशाली एवं स्थापित सास राज्य होता है इसलिए वो विजीगीषु से सर्वाधिक असुरक्षित महसूस करता है। और ननद राज्य अधिकतर सास राज्य का उपनिवेश होता है यानी कि पूर्ण विकसित सत्ता नहीं बल्कि सास राज्य की सहयोगी सत्ता होता है। ये सम्प्रभुता सम्पन्न नहीं होने की वजह से अधिकांश सिर्फ़ नारद की भूमिका तक ही सीमित रह जाता है।

इस मंडल को आप निम्न रेखाचित्र द्वारा आसानी से समझ सकते हैं-

%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a1%e0%a4%b2

आचार्य चाणक्य आदर्श विदेश नीति की विवेचना करते हुए आगे लिखते हैं कि अरिमित्र (शत्रु का मित्र) भी अपना शत्रु होता है इसलिए हमें सदैव उससे सावधान रहना चाहिए। लेकिन हमारे ‘शत्रु का शत्रु’ हमारा मित्र हो सकता है इसलिए हमें उससे संधि करने का प्रयास करना चाहिए। आचार्य ने देवरानी-या-जेठानी-की-भोजाई-राज्य को विजीगीषु का संभावित सहयोगी माना है तथा उनसे सहयोग प्राप्त करने का प्रयास करने का सुझाव विजीगीषु को दिया है।

चूंकि जेठानी राज्य तथा देवरानी राज्य भी कभी वृहद सास राज्य के अंग हुआ करते थे जो कि बाद में इससे अलग हो कर इसके पड़ोसी हो गए, जैसे भारत से पाकिस्तान और बांग्लादेश। इसलिए वो भी निश्चित रुप से सास राज्य के अरि (शत्रु) होते हैं। इसलिए चाणक्य ने सुझाव दिया है कि विजीगीषु को शत्रु का शत्रु= मित्र की नीति अपना कर इस स्थिति का लाभ उठाते हुए शुरुआत में उनसे संधि करके विशाल सास राज्य से मुकाबला करना चाहिए जिस प्रकार मुहम्म्द गौरी ने जयचंद से संधि करके पृथ्वीराज चौहान से मुकाबला किया था। हालांकि विजीगीषु-जेठानी-देवरानी गठबंधन भी हितों के टकराव की वजह से ज्यादा समय तक टिक पाना संभव नहीं है लेकिन अथाह शक्तिशाली सास राज्य को पराजित करने के लिए आचार्य ने इसे एकमात्र ऊपाय बताया है।

विजीगीषु को अपने शत्रु राज्य को कमजोर करने के लिए साम-दाम-दंड-भेद द्वारा इसके सहयोगी राज्यों को इस से अलग करने का प्रयास करना चाहिए। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु दंड की बजाय भेद को उत्तम बताते हुए चाणक्य कहते हैं कि सर्वप्रथम विजीगीषु को मौका मिलते ही अपने ननद राज्य को अपने सास राज्य के प्रभुत्व से छुटकारा पाने के लिए उकसाना चाहिए ताकि वो सास राज्य के खिलाफ विद्रोह कर दे। यदि इस से काम ना बने तो फिर विजीगीषु को देवरानी-जेठानी गठबंधन की मदद से ननद राज्य के राजा को खदेड़ कर उसके राज्य पर कब्जा कर लेना चाहिए ताकि उसे भागकर किसी अन्य दूरस्थ राज्य से गठबंधन (विवाह संबंध) स्थापित कर के शरण लेनी पड़े। हालांकि इस ऐतिहासिक पराजय के बाद भी ननद राज्य जीवनभर वर्ष में एकाध बार (अधिकतर जुलाई की छुट्टियों में) विजीगीषु पर हमले करता रहेगा। परन्तु उसकी शक्ति इतनी क्षीण हो चुकी होगी कि निरंतर हमलों के बावजूद वो कभी भी अपना राज्य पुन: नहीं प्राप्त कर सकेगा और फिर कालांतर में उसके वंशज उसी दूरस्थ स्थान पर बस कर रह जाएंगे जिस प्रकार मुगल समरकंद से खदेड़े जाने पर भारत में आ कर बस गए थे।

इस प्रकार ननद राज्य से छुटकारा मिलने के बाद विजीगीषु के लिए कमजोर पड़ चुके सास राज्य पर कब्जा करना काफी आसान हो जाएगा। फिर भी यदि आवश्यकता हो तो सास राज्य के परम्परागत शत्रु बड़ी सास, काकी सास राज्यों की मदद ली जा सकती है। अगर वो सास राज्य के भय से इनकार कर दें तो सास राज्य द्वारा अपने विस्तार काल में खदेड़े गए बुआ सास राज्य को भी मदद के लिए बुलाया जा सकता है, हालांकि वो दूरस्थ स्थान पर अथाह संघर्ष के बाद अपना साम्राज्य स्थापित कर चुका होगा परन्तु वह अपनी पुरानी पराजय का प्रतिशोध लेने के लिए विजीगीषु का साथ अवश्य ही देगा।

इस सम्पूर्ण राजनैतिक उथल-पुथल दौरान कई बार ससुर, देवर, जेठ जैसे गुलाम राज्य भी अपनी भूमिका अदा करते हैं तथा इस उठापटक के बीच कई दफ़ा स्वतंत्र होने के असफल प्रयास भी करते हैं।

सास राज्य पर विजय प्राप्त करने के पश्चात विजित साम्राज्य के बंटवारे को लेकर विजीगीषु-देवरानी-जेठानी गठबंधन टूटना निश्चित माना गया है। और फिर इनमें आपस में सत्ता-संघर्ष शुरु हो जाता है जिस प्रकार प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात पराजित जर्मनी के बंटवारे को लेकर मित्र राष्ट्रों में हुआ था। और यह सत्ता संघर्ष अनवरत तब तक चलता रहता है जब तक कि मंडल में कोई नया विजीगीषु उत्पन्न ना हो जाए।

GhanShyam Singh Odint.

 

← All articles