मूर्तियों का देश
हमारी तहसील में 140 गांव आते हैं जिनकी कुल जनसंख्या पौने तीन लाख (2011 जनगणना के अनुसार) के आसपास है। 140 गांवों के लिए सिर्फ 5-7 बैंक हैं और इतने ही एटीएम, वो भी सिर्फ तहसील मुख्यालय पर। आप बैंक में पैसे निकालने के लिए जाइए, 2-3 घंटे से पहले आप पैसे नहीं निकाल पाएंगे इसकी गारंटी है (मैं नोटबंदी के बाद की नहीं, उससे पहले के सामान्य दिनों की बात कर रहा हुं)। SBI में यदि कोई मात्र दो दिन में अपना अकाउंट खुलवाने में सफल हो जाए तो समझ लीजिए कि या तो वो खुशकिस्मत है या उसकी बैंक में कर्मचारियों से जान-पहचान है। बैंक कर्मचारियों की हालत ऐसी लगती है जैसे कोई मदारी सङक पर खेल दिखा रहा हो.. पूरे दिन में कभी भी देखिए एक कर्मचारी को 20-25 लोग घेरे खङे होंगे। फिर भी आप उन कर्मचारियों से विनम्र रहने की और बेहतर सेवा देने की उम्मीद करते हैं तो बेवकूफ हैं आप।
मेरे गांव की आबादी लगभग 4000 है, कायदे से वहां बैंक नहीं तो एटीएम कम से कम जरुर होना चाहिए.. लेकिन तहसील मुख्यालय के बाद सबसे बङा कस्बा निम्बी जोधां है जिसकी आबादी लगभग 12 हजार है तथा यह 30-35 गांवो की खरीददारी का केंद्र है, वहां भी कोई बैंक या एटीएम नहीं है। मुझे वहां बैंक/एटीएम चाहिए, अरब सागर में शिवाजी की मूर्ति नहीं।

कुछ लोगों का कहना है कि देश में लोग भूखे मर रहे हैं। मैंने आजतक अपने 26 वर्ष के जीवन में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं देखा जिसके पास खाने के लिए अनाज ना हो। लेकिन सिर्फ भोजन ही हमारी एकमात्र आवश्यकता नहीं है। उसके अलावा भी हमारी कई बेसिक जरुरतें हैं जो कि पूरी होनी आवश्यक है अमेरिका की होङ करने से पहले। मुकेश अंबानी के पास 27 मंजिला एंटीला है क्योंकि वो अफोर्ड कर सकता है, मेरे पास नहीं है क्योंकि एंटीला से पहले मेरी जो प्राथमिकताएं हैं वही नहीं पूरी होतीं।
आंकड़ों पर थोड़ा गौर करेंगे तो पाएंगे कि शिवाजी के इस स्टेच्यू का अनुमानित बजट 2004 में सिर्फ 100 करोङ था, 2009 में 700 करोङ हुआ, 2013 में 1400 करोङ हुआ और इस प्रकार कुल 35 बार बढते-बढाते अब 3600 करोङ हुआ है। जब तक बनकर तैयार होगा बजट कितना होगा खुद सोच लीजिए? अंदाजा लगाने के लिए काॅमनवेल्थ गेम्स का बजट याद कीजिए जो 2002 में 617.5 करोङ तय हुआ था जो बाद में गेम्स होते होते लगभग 30 हजार करोङ पहुंच गया था एवं दिल्ली के माॅडिफिकेशन के लिए 66 हजार करोङ खर्च किए बताते हैं गेम्स के लिए।
सरकार को उम्मीद है, हां सिर्फ उम्मीद है कि प्रतिदिन दस हजार यानी सालाना साढे 36 लाख पर्यटक इसे देखने आएंगे जबकि अमेरिका के Statue Of Liberty को देखने सिर्फ लगभग 32 लाख आते हैं। और पर्यटक इसलिए नहीं आते कि वो बङा है, बल्कि इसलिए आते हैं कि वो ऐतिहासिक है और जब वो बना था तब वैसा बना पाना बहुत मुश्किल था। और यह प्रतिदिन दस हजार पर्यटकों का जो संभावित आंकङा है वो भी नए पर्यटकों का नहीं है। इनमें से नौ हजार तो बिना इस स्टेच्यू के वैसे भी मुंबई देखने आ ही रहे होंगे?
पर्यावरण को जो नुकसान होना है उससे तो हमें कोई फर्क पङता भी नहीं है, इसलिए उसकी बात रहने देते हैं। रहने इसलिए भी देते हैं कि सरकार ने भी रहने दिया है। तमाम पर्यावरण समस्याओं को दरकिनार करके सरकार ने मात्र 19 दिन में ड्राफ्ट नोटिफिकेशन से इतने बङे प्रोजेक्ट को बिना public hearing के पास करवा लिया है।
वैसे इस स्टेच्यू से मेरे चिंतित होने की मुख्य वजह दूसरी है। वो है इस स्टेच्यू के बनने का कारण और हम भारतीयों की प्रवृति।
आंध्र में हनुमान जी का विश्व का सबसे बङा स्टेच्यू बना, जिसकी वजह से गुजरात में पटेल का उससे बङा स्टेच्यू बना, जिसकी वजह से महाराष्ट्र में शिवाजी का उससे बङा स्टेच्यू बन रहा है, जिसकी वजह से जल्दी ही राजस्थान में महाराणा प्रताप का इससे बङा स्टेच्यू बनेगा, जिसकी वजह से आखिर में यूपी में मुलायम सिंह का स्टेच्यू बनेगा, जिसकी वजह से बिहार में लालू यादव का स्टेच्यू बनेगा। यही हम भारतीयों की प्रवृति है। वहां बना है तो यहां क्यों नहीं? महाराष्ट्र में बना है तो राजस्थान में क्यों नहीं? हम क्या किसी से कम हैं?
आखिर में बस इतना ही कि मुझे समस्या शिवाजी की मूर्ति से नहीं, 3600 करोङ की मूर्ति से है। अब भी ना समझ में आए तो एक बार यूनान (ग्रीस) याद कर लीजिए, जिसने ओलिंपिक आयोजित करवा कर दिवालिया होना चुना था।

