प्रतीकों का मोह

(गिटार की जगह महापुरुषों को रखकर पढिए)
कुछ साल पहले मैंने एक गिटार खरीदा। खरीदने के बाद मैंने उस गिटार के साथ विभिन्न पोज में फोटो खिंचवा कर फेसबुक पर डाले और खूब वाहवाही बटोरी। काॅलेज में भी कई बार गिटार को पीछे टांग कर गया और खूब इंप्रेशन झाङा। घर में भी चारों तरफ जस्टिन बीबर से लेकर हिमेश रेशमिया तक की फोटोज लगा लीं और गिटार को बेड के बिल्कुल पास वाली खूंटी पर टांग दिया। लेकिन आज लगभग गिटार को वहां टंगे 8-10 साल हो गए लेकिन मुझे आज तक DDLJ वाली ट्यून तक बजानी नहीं आई। साली किस्मत ही खराब है वरना आज हनी सिंह की जगह मैं होता।
मेरे साथ ही मेरे एक मित्र ने भी गिटार खरीदा था। हालांकि उसका गिटार मेरे गिटार से सस्ता था। और वो रोज दिन-रात उसे बजाता रहता था इसलिए साल भर में उसका गिटार खराब भी हो गया। लेकिन वो इस एक साल में गिटार बजाने में काफी माहिर हो चुका था और उसे लोग कई छोटे मोटे प्रोग्राम्स में बुलाने लगे जिनसे पैसे कमाकर उसने मुझसे भी अच्छा गिटार खरीद लिया। आज वो देश-विदेश में गिटारिस्ट के रुप में प्रसिद्ध हो चुका है और बङे बङे कलकारों के साथ शो करता है। मुझे गर्व है कि मैं उसका दोस्त हुं।

और हां, मेरा वाला गिटार अभी भी सजा हुआ है.. जस का तस.. वहीं.. मेरे बेड के पास वाली खूंटी पर। कल मेरे गिटार की 17वीं जयंती है।

(अफसोस कि हमारी कोशिश गिटार को बजाने की कम और टांगने की ज्यादा रहती है)

← All articles