गर्व
हम भारतीयों की खासियत है कि हम गौरवान्वित होने का कोई भी मौका नहीं छोङते। देश, भाषा, संस्कृति, जाति, धर्म, इतिहास, वंश किसी पर भी गर्व कर सकते हैं हम। भाषा सिर्फ संवाद के लिए ईजाद हुई थी, हम ने उसे भी मेरी श्रेष्ठ- तेरी खराब के अखाङे में उतार लिया। गर्व का विषय बनाकर मरने-मारने का प्रश्न बना लिया। मतलब गर्व कर पाने की हमारी क्षमता का विश्व में कोई सानी नहीं। लेकिन समस्या यह है कि अधिकतर हम गर्व उन्हीं चीजों पर कर बैठते हैं जिनमें हमारा कोई योगदान भी नहीं। यहां तक कि कल्पना चावला, सुनीता विलियम्स पर भी जी भर भर कर गर्व करते हुए बङे हुए हैं हम। और तो और अमेरिकी सीनेटर बाॅबी जिंदल तक जा पहुंचते हैं गर्व करने के लिए। बताइए, बंदा कहता है कि मैं शुद्ध रुप से अमेरिकी हुं और हम हैं कि गर्व करने के लिए उसे जबरदस्ती भारत से जोङ ही देते हैं उसकी पीढियों का इतिहास खंगालकर।
दरअसल हमारी ज्यादा गलती भी नहीं इसमें। हमें बङा ही इसी तरह किया जाता है। घर, स्कूल, काॅलेज, समाज हर कहीं यह गर्व ही बिखरा मिलता है चारों तरफ। हमें कभी किसी ने बताया ही नहीं कि गर्व सिर्फ खुद की उपलब्धियों पर की जा सकने वाली चीज है या उन उपलब्धियों पर किया जा सकता है जिनमें आपका कोई योगदान है। आप एग्जाम में कम/ज्यादा जितने भी अंक लेकर आए हैं उस पर आप दिल खोल कर गर्व कर सकने के हकदार हैं, लेकिन मैरिट में आए किसी बंदे का सिर्फ सरनेम/जाति खुद से मिला कर गर्व करने की आपकी क्षमता को बाकी दुनिया में (शब्द को सेंसर करने के बाद) क्यूटियापा कहा जाता है। लेकिन हम हैं कि ये गर्व भी बङे गर्व से करते हैं।
इसी सिक्के का दूसरा पक्ष और भी मजेदार है। दूसरा पक्ष है ज्यादा समझदारों का यानी बुद्धिजीवियों का। बुद्धिजीवियों को यह तो पता है कि देश/धर्म/इतिहास/जाति पर गर्व नहीं करना चाहिए लेकिन वो इन पर शर्मिंदा होने से नहीं चूकते। ऐसे ही एक बुद्धिजीवी कलाकार हैं सुशांत सिंह जो कि पहले राजपूत भी हुआ करते थे। कहीं दूर किसी जयपुर नामक नगरी में उन्हीं के जाति/सरनेम के लोगों ने भंसाली को दो थप्पङ मार दिए जिससे ये इतने शर्मिंदा हुए कि नाम से राजपूत ही हटा लिया। समझ में यह नहीं आता कि कल को अगर दुनिया के किसी कोने में सुशांत नामक किसी व्यक्ति ने कोई बलात्कार कर दिया तो ये क्या हटाएंगे? या परसों किसी राजपूत जाति/सरनेम वाले बंदे ने कोई महान कार्य कर दिया तो क्या ये ‘राजपूत’ वापस लगाएंगे? कायदे से तो लगाना चाहिए।
जब हम सिर्फ हमजाति होने की वजह से किसी के कार्यों पर शर्मिंदा हो सकते हैं तो फिर हमजाति होने की वजह से किसी के कार्यों पर गर्व क्यों नहीं कर सकते? और सिर्फ किसी के हमजाति होने की वजह से आप गर्व करने के हकदार हो जाते है तो फिर आपके सभी हमजातियों के कुकर्मों के जिम्मेदार आप क्यों नहीं?
अगर हैं तो हक और शर्म दोनों आपके हैं, नहीं तो दोनों आपके नहीं हैं। बेशर्मी से अपनी सुविधानुसार छांटना छोङिए।
