सनातन (Part 3)

तो लगभग हजारेक साल पहले ‘हिंदू रिलीजन’ के उदय से पहले यहां कौनसा रिलीजन था?

अब्राहमिक मजहबों के यहां आगमन से पूर्व तक भारत भूभाग बिना किसी मजहब/रिलीजन के ही रहा। यहां ना कोई हिंदू था, ना कोई सनातनी, ना कोई बौद्ध, ना कोई जैन। यहां किसी भी व्यक्ति का कोई रिलीजन नहीं था। रिलीजन बहुत बाद में आए बाहर से। यहां लोग जानते भी नहीं थे कि रिलीजन जैसी कोई चीज भी होती है क्या? जैसे हम आज से 15 साल पहले तक ये नहीं जानते थे कि फेसबुक/ट्विटर अकाउंट जैसी कोई चीज होती है, वैसे ही। कहने का अर्थ है कि तब रिलीजन वाला कॉलम ही नहीं होता था। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि यहां लोग आस्तिक नहीं थे। यहां सबके अपने अपने ईश्वर/भगवान थे, अपनी अपनी पूजा पद्धतियां थीं, सबके अपने अपने अलग अलग रीति रिवाज थे। रीति रिवाजों की इन विभिन्नताओं के अवशेष आज भी मौजूद हैं। कोई जाति में चार फेरे लेते हैं, तो कोई में सात। किसी गांव में उत्तर की तरफ सिर करके मुर्दों को जलाते हैं तो पड़ोस के गांव में दक्षिण की तरफ। किसी क्षेत्र में दाह संस्कार के दिन मुंडन करवाते हैं, तो कहीं तीसरे दिन और कहीं बारहवें दिन। ऐसी हजारों-लाखों विभिन्नताएं यहां आज भी मौजूद हैं।

तो उस समय भी अलग अलग लोगों में अलग अलग मान्यताएं थीं। ये सब अलग अलग मजहब नहीं थे बल्कि अलग अलग cult थे (शैव, गाणपत्य, शाक्त, वैष्णव आदि) जिनमें बहुत सारी चीजें सेम थीं तो बहुत सारी चीजें भिन्न थीं, लेकिन घुमा फिरा कर बेसिक कॉन्सेप्ट सब के सेम ही थे, सब किसी ना किसी अलौकिक शक्ति को इस संसार का सर्वेसर्वा एवं रचियता मानते थे। सबने अपनी अपनी समझ, परिस्थितियों, आवश्यकता एवं कल्पनाशक्ति के आधार पर अपने अपने ईश्वर रच लिए थे। हालांकि आज ये सब इस प्रकार गुंथ चुके हैं कि इनके बारे में कोई स्पष्ट दावा कर पाना असंभव है लेकिन मेरे ख्याल से रेगिस्तानियों ने इंद्र (बरसात का देवता) का आविष्कार किया होगा, वहीं क्षत्रिय (कोई जाति विशेष नहीं बल्कि जो लड़ाके होते थे) शायद शक्ति यानी मातेश्वरी के उपासक रहे होंगे। ऐसे ही कोई शिव को ईश्वर मानता था तो कोई विष्णु को तो कोई पीपल को तो कोई गणपति को। लाखों भगवान थे यहां, अलग अलग गांव/कबीले/घर के अलग अलग देवता (जिन्हें कालांतर में मोटा मोटी अंदाजे से 33 करोड़ स्वीकार किया गया)। किसी गांव के लोग मानते थे कि पीपल देवता एकमात्र ईश्वर हैं तो दूसरे गांव वाले मानते थे कि सूर्य भगवान एकमात्र ईश्वर हैं तो उससे अगले गांव वाले मानते थे कि तुलसी माता या धरती माता या अग्नि देवता या चंद्रमा देवता एकमात्र सर्वेसर्वा हैं। कोई मानता था कि पृथ्वी शेषनाग के फण पर टिकी है तो कोई मानता था कि गाय के सींग पर टिकी है। कुल मिलाकर सबके अपनी अपनी मान्यताएं थीं एवं अपने अपने पर्सनल अल्लाह थे, हालांकि कई ऐसे भी थे जो इनमें से एक से अधिक भगवानों को भी मानते थे।

शायद अधिकतर जगह एक दूसरे के ईश्वरों को मान्यता एवं सम्मान दिया जाता था, परन्तु कई जगह अपने वाले ईश्वर को सबसे शक्तिशाली साबित करने के लिए खून खराबा भी हुआ। बाकी अन्य तो शायद संख्या में कम होने की वजह से उनके झगड़े उतने चर्चित नहीं रहे होंगे लेकिन शैव (शिव को मानने वाले) और वैष्णव (विष्णु के उपासक) चूंकि जनसंख्या में अधिक थे इसलिए इनके बीच हुआ खून खराबा इतिहास के कई पन्नों में दर्ज है। आज सुनने में भले ही यह बहुत अजीब लगे परन्तु एक दौर में शैव और वैष्णव दो अलग पंथ (आज की भाषा में कहें तो अलग अलग धर्म) थे एवं एक दूसरे के जानी दुश्मन रहे जैसे कभी यजीदी और मुसलमान रहे या ईसाई और यहूदी रहे। शिव को मानने वाले विष्णु को पूर्णतया खारिज करते थे तथा विष्णु को मानने वाले शिव को भगवान मानने से इनकार करते थे, जबकि कई अन्य (आज वाले हिंदू देवी देवताओं के उपासक) ऐसे भी थे जो इन दोनों को ही खारिज करते थे और अपने देवता को सर्वोच्च मानते थे। ठीक वैसे ही जैसे आज मुसलमान राम को ईश्वर मानने से और हिंदू अल्लाह को ईश्वर मानने से इनकार करते हैं।

तो ये इस प्रकार का सीन था। लेकिन जहां तक मैं समझता हुं इनमें से किसी भी cult की लिखित या निश्चित नियमावलियां नहीं थी, उनके रीति रिवाज किसी एक व्यक्ति द्वारा बनाए हुए नहीं बल्कि प्राकृतिक एवं आवश्यकता अनुरूप हुआ करते थे। हर cult में नये देवता/भगवान और रीति रिवाज दूसरे cult से आवश्कता एवं परिस्थिति अनुसार आते रहते थे और स्वीकार हो कर एक दूसरे में मिश्रित होते रहते थे। इसी मिश्रण का कमाल था कि समय बीतते बीतते ये सभी cult आपस में घुल मिलकर खिचड़ी हो गये मतलब मिक्स हो गये, एकाकार हो गये, आज यह पता लगा पाना भी असंभव है कि किस व्यक्ति के पूर्वज किस पर्टिकुलर देवता के उपासक थे। और यह सब इसलिए संभव हो पाया क्योंकि इनमें से अधिकतर लोग कट्टर नहीं थे, एक से दूसरे गांव, पंथ आदि में वैवाहिक संबंध स्थापित हुआ करते थे, जिसके फलस्वरूप एक ही परिवार में पिता शैव होता था तो मां वैष्णव और दादी ब्रह्मा आदि की उपासक। जिसके परिणामस्वरूप बालक तीनों को ही मानने वाला होता था। आपसी संबंधों की वजह से धीरे धीरे शैव विष्णु को स्वीकार करने लगे, वैष्णव शिव को स्वीकार करने लगे। जैसे आज गंगा-जमुनी तहजीब को स्थापित करने के लिए कहा जाने लगा है कि ईश्वर/अल्लाह/वाहेगुरु/जीसस सब एक ही हैं बस नाम अलग अलग हैं, वैसे ही तब धीरे धीरे यह कहा जाने लगा कि शिव, विष्णु, ब्रह्मा, शक्ति सब एक ही हैं बस रूप अलग अलग हैं, सब परस्पर एक दूसरे के भक्त हैं, कोई बड़ा छोटा नहीं है सब समान हैं।

शायद उसी समय कुछ बुद्धिजीवियों ने इस सद्भावना को बढाने के लिए कथाएं रचीं और शिव तथा विष्णु दोनों के साथ ब्रह्मा जी को सेट करके तिकड़ी क्रिएट कर दी। गणपति को शिव के गोद दे दिया गया, शक्ति को सम्पूर्ण संसार की जननी स्वीकार कर लिया गया। चूंकि शैवों और वैष्णवों में से कोई भी एक दूसरे के भगवान को संसार का रचियता और सर्वेसर्वा स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था, खुद के भगवान से ज्यादा पावरफुल स्वीकार करने को तैयार नहीं था, तो दोनों को कॉमन मिनिमम एजेंडा के तहत राजी करने के लिए रचियता का पद ब्रह्मा जी को दे दिया गया और विष्णु को जगत का पालनहार/मैनेजर तो शिव को सृष्टि का विनाशक (आवश्यकता पड़ने पर) स्वीकार करके तीनों को बराबर पावरफुल मान लिया गया। जबकि उससे पहले ब्रह्मा जी के फॉलोवर (जो शायद ब्राह्मण थे) अल्पसंख्यक थे, यहां तक कि ब्रह्माजी का मंदिर भी सिर्फ एक ही जगह पुष्कर में बनवाया जा सका था, यहां तक कि ब्रह्माजी के बारे में कथाएं और उनकी उपलब्धियां भी बहुत सीमित हैं और उन्होंने कोई अवतार वगैरह भी नहीं लिया। परन्तु शैवों और वैष्णवों को किसी एक पॉइंट पर सहमत करने के लिए ब्रह्माजी को संसार के रचियता का पद दिया जाना जरूरी था जैसे राजस्थान भाजपा प्रदेशाध्यक्ष पद के लिए वसुंधरा और गजेंद्र सिंह शेखावत की खींचातानी को मिटाने के लिए प्रदेशाध्यक्ष पद मदनलाल सैनी को दे दिया गया।

इस घुलन प्रक्रिया के उत्तर्राद्ध के दौरान ही जैनिज्म का भी उदय हुआ। जैनिज्म को भी मैं अलग रिलीजन की बजाय एक कल्ट की श्रेणी में ही रखना चाहुंगा जैसे आर्य समाज है। जैनिज्म अलग होते हुए भी हिंदुइज्म से आजतक अलग नहीं है। इस संदर्भ में मेरा मत है कि बौद्धिज्म इस भारतीय भूभाग का प्रथम अलग रिलीजन था, जिसका बेसिक कॉन्सेप्ट यहां के existing cults से अलग था। बौद्धिज्म ने ‘ईश्वर’ के कॉन्सेप्ट को ही खारिज कर दिया और एक नये ‘मोक्ष’ के कॉन्सेप्ट को इंट्रोड्यूस किया जिसके अनुसार जीवन का लक्ष्य अब ईश्वर को प्राप्त करने की बजाय मोक्ष को प्राप्त करना था। मेरा मानना है कि ‘मोक्ष’ का कॉन्सेप्ट सनातन में बौद्धिज्म से ही आया उससे पहले नहीं था, सनातन ने ईश्वर को खारिज नहीं किया लेकिन मोक्ष को भी साथ में जीवन का उद्देश्य मान लिया। यहां हो सकता है मैं गलत भी होऊं क्योंकि वेदों का रचनाकाल लगभग 4000 साल पूर्व माना जाता है जबकि बौद्धिज्म का उद्भव लगभग 2500 वर्ष पूर्व हुआ। लेकिन वेद में काफ़ी कुछ बाद में एड हुआ बताते हैं मेरे ख्याल में शायद मोक्ष भी उनमें से एक था। खैर यदि मेरी यह अवधारणा गलत भी है तो भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बौद्धिज्म और जैनिज्म से बहुत सारी चीजें सनातन में इन्क्लूड हुईं जो पहले नहीं थीं। खैर इस पर विस्तृत चर्चा फिर कभी।

उसी दौर में यहां के लोगों का पश्चिम से संपर्क बढा। सिकंदर आदि के दौर में रोम से गहरा संपर्क रहा जिसके फलस्वरूप रोमन माईथोलॉजी एवं हिंदू माईथोलॉजी के कैरेक्टर्स, कहानियों में आश्चर्यजनक समानताएं हैं। हालांकि यह तय कर पाना भी अब लगभग असंभव है कि ये पात्र, कहानियां कहां से कहां कॉपी किए गए थे। उसके बाद पश्चिम में ईसाईयत का उदय हुआ, जिसके फ़लस्वरूप यहां कि कई चीजें ईसाईयत में और ईसाईयत की कई चीजें इधर सनातन में मिक्स हुईं। मुझे लगता है कि ‘ईश्वर से डर’ का कॉन्सेप्ट सनातन में ईसाईयत या इस्लाम से ही आया। तो इस प्रकार यहूदी, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी आदि सभी से कुछ लेते देते हुए सनातन चलता रहा आज से हजार साल पहले तक। आज से लगभग हजार वर्ष से पहले कहीं भी हिंदू शब्द का जिक्र नहीं मिलता है।

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