मुझे नए लोग नहीं मिलते
मैं नये लोगों से मिलना चाहता हुं, लेकिन नये लोग नहीं मिलते। सिर्फ 5-10 अपवाद छोड़ दूं तो बस सेम ही आदमी नये नये चेहरों के साथ मिलता है रोज। वही बातें, वही सोच, वही सबकुछ। कुछ भी नया नहीं मिलता सिर्फ चेहरे के अलावा।
अस्पताल में बैठे किसी भी चेहरे से बात कीजिए वो कहेगा कि अस्पताल तो सब लूट के अड्डे हैं जी। “डॉक्टर 5 मिनट देखने के 300₹ ले लेता है”।
लेगा भाई.. करोड़ रूपये लगाए हैं उसने डॉक्टर बनने के लिए। बहुत कम ले रहा है 300 रूपये। पंक्चर वाला दो पंक्चर बनाने के 100₹ ले लेता है जिसका दस हजार का इन्वेस्टमेंट नहीं है और घंटे की एक्सपर्टीज नहीं है। अगला करोड़ों रूपये का इन्वेस्टमेंट करके बैठा है और 80 रूपये में ECG कर रहा है लेकिन तुम कह रहे हो कि तुम्हें लूटा जा रहा है? और कभी यह भी तो सोचो कि है ही क्या तुम्हारे पास लूटने को, ईलाज तो तुम भामाशाह/चिरंजीवी कार्ड से करवा रहे हो? चाय के 10 रूपये देने में भी चाय वाले से आधा घंटा बहस करते हो, क्या ही लूट लेगा कोई तुम्हारा?
डॉक्टर मना करके जाता है कि मरीज को 4 घंटे कुछ खिलाना पिलाना नहीं है, घरवाले लगे पड़े हैं जबरदस्ती उसके मुंह में बिस्किट ठूंस देने को। मुझे समझ नहीं आता कि जब तुम डॉक्टर से ज्यादा जानकार हो तो फिर इसको लाए ही क्यों हो अस्पताल? घर पर ही कर लेते ईलाज, क्यों लुटवा रहे हो खुद को? लेकिन अस्पताल में मेरे पास बैठा आदमी कहता है कि उसे लूटा जा रहा है.. क्योंकि वो जब से पैदा हुआ है उसने लोगों को यही कहते सुना है। अस्पताल में बैठकर यही सब कहना होता है। नया कुछ है ही नहीं कहने को। यह सब सेलेबस है इनका, रिपीट पैटर्न है पीढी दर पीढी। दशकों हो गए, अलग अलग स्तर के हॉस्पिटल में जाकर देख लीजिए सब जगह सेम सीन देखने को मिलता है।
इस आदमी ने कुछ भी ऐसा नहीं किया होगा जो इसका अपना खुद का हो। सबकुछ वही किया है जो सब करते हैं, क्योंकि सब वही तो करते हैं।
शादी में वही शेरवानी, वही साफा, वही घोड़ी पर बैठना, वरमाला के टाईम वही गर्दन ऊपर नीचे करने की नौटंकी, वही पोज, वही शादी पर सदियों पुराने जोक्स..
किसी की मौत पर वही रटी-रटाई संवेदनाएं। रोज सुबह वही वाट्सएप स्टेटस। पैदाइश से आज तक वही सेम पॉलिटिकल स्टैंड। वही अलग अलग वाद (विचारधाराओं) की गुलामी। वही जाति-धर्म तक सीमित सोच।
अमीर लोग सब बुरे होते हैं, गरीब लोग सब अच्छे होते हैं।
पाकिस्तानी सब खराब हैं, हिंदुस्तानी सब अच्छे है।
हमारी संस्कृति-परम्पराएं सब से अच्छी है, हमारी भाषा के जितनी समृद्ध दुनिया में कोई भाषा नहीं है।
हमारी जाति दुनिया की सबसे सर्वश्रेष्ठ जाति है, हमें सब पार्टियां दबाना चाहती हैं, हम से सब जलते हैं, हमारे इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया।
हमारा धर्म सबसे महान है, जो भी दिक्कते हैं सब मैकॉले की वजह से हैं।
नेताओं के भाषण सुनिए, ग्रुप में बैठी औरतों को सुनिए, बस/ट्रेन में बहसें सुनिए, चाय की थड़ी पर चर्चा सुनिए, पार्क में बैठे बुड्ढों को सुनिए.. किसी को भी सुनिए... वही 100-200 जुमले, मुहावरे और उदाहरण रिपीट पर हैं। वाट्सएप ज्ञान ने टेकओवर कर लिया है।
पार्क में सामने बैठे एक रिटायर्ड बुजुर्ग साथियों को बता रहे हैं कि राजपूत कभी मांस नहीं खाते थे, फिर अकबर ने चाल चलकर धर्मभ्रष्ट करने के लिए राजपूतों को मांसाहारी बना दिया। और मैं दावे के साथ कह सकता हुं ये खुद मांसाहारी होंगे, लेकिन चूंकि कहने सुनने में ऐसी बातें अच्छी लगती हैं इसलिए कह रहे हैं। कहीं 5-7 लोग बैठे हों तो ऐसी बातें कहने से इम्प्रेसन पड़ता है, इसलिए कह रहे हैं। बस कहने को कह रहे हैं।
दो लेयर हैं दुनिया की। एक जो वास्तव में हो रहा है और दूसरा हम सिर्फ कह रहे हैं क्योंकि कहने-सुनने में अच्छा लगता है। सुनने वाले और कहने वाले दोनों को पता भी है कि यह सिर्फ कहने-सुनने के लिए है... लेकिन एक नशा है, खुमार है खुद को वेलिडेट करवा लेने का। एक जैसी बातें कहने सुनने से समाज में वेलिडेशन मिलता है, घुलनशीलता बढती है, Fit in होने में मदद मिलती है।
सबकुछ तो एक जैसा है तुम्हारा, रिपीट टेपरिकार्डर की तरह। क्या ही बात करे तुमसे कोई?

