अच्छाई का CIBIL स्कोर
यहां अधिकतर लोगों को CIBIL स्कोर के बारे में पता ही होगा, यानी बंदे का क्रेडिट स्कोर कि पहले बंदे ने कहीं से लोन वगैरह लिया है तो टाईम पर भरा या नहीं, मतलब लेनदेन का व्यवहार कैसा है बंदे का।
ठीक उसी प्रकार, गांवों में भी एक तरह का अघोषित/अदृश्य रेटिंग सिस्टम होता है। किसी भी बंदे ने पैदा होने से लेकर अब तक किन लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया है, पढाई में कैसा है, लेनदेन में कैसा है, व्यवहार में कैसा है, ईमानदार कितना है, बुरी आदतें कितनी हैं, नशे-पते करता है या नहीं, कैरेक्टर कैसा है, किसका कितना उधार नहीं चुकाया है, कितने बीघा जमीन हिस्से आती है आदि आदि फैक्टर्स के आधार पर बंदे की एक अघोषित/अदृश्य रेटिंग तय होती है। उसी रेटिंग के आधार पर बंदे को कितना मान सम्मान, कितना भरोसा, कितना उधार, शादी में निमंत्रण आदि देना है या नहीं आदि आदि निर्धारित होता है। चूंकि गांव पूरा आपस में “चुगलीNet” से कनेक्टेड होता है तो गांव के हर नागरिक के पास हर बंदे का डाटा 8G स्पीड से ऑटोमैटिक अपडेट रहता है। सिर्फ गांव ही नहीं बल्कि गांव की 20-30 किलोमीटर की radius में यह स्कोर वैलिड होता है, आवश्यकता पड़ने पर गांव के किसी भी बंदे को फोन करके वेरीफाई कर लिया जाता है उधार देने से पहले।
मेरे हिसाब से यह एक बहुत अच्छी व्यवस्था है, क्योंकि सिबिल खराब होने के डर से ही बंदा टाईम पर लोन भरेगा। अच्छाई का आपके अकाऊंट में दर्ज होना आपको अच्छाई के लिए प्रेरित करता है।
लेकिन दिक्कत तब आती है जब गांव का बंदा दूरदराज शहर में शिफ्ट होता है। चूंकि शहर अभी तक पिछड़ेपन की वजह से चुगलीNet से कनेक्टेड नहीं हो पाए हैं तो बंदे का 25-30 साल की मेहनत से बनाया गया सिबिल स्कोर पीछे गांव में ही रह जाता है। पता चलता है कि बरसों की मेहनत/त्याग/तपस्या से हासिल किया गया उसका “चरित्र प्रमाणपत्र” शहर के DigiLocker में डाऊनलोड ही नहीं हो पा रहा। शहर में किसी को नहीं पता कि उसको कितनी नॉलेज है, कितना टैलेंट है या कितना ईमानदार है, इसलिए शहर में आते ही उसकी रेटिंग शून्य हो जाती है। एक बंदा जिसकी गांव में रेटिंग एक्सीलेंट थी और दूसरे की एकदम poor थी, दोनों शहर में आकर सेम स्कोर पर आ जाते हैं। यह अव्यवस्था हरामी लोगों के लिए मुफीद है, वो एक सर्किल में लोगों को चूना लगाकर सर्किल चेंज कर लेते हैं और नये सर्किल में जाकर वहां एकदम पाक़-साफ हाज़ी बन जाते हैं, जहां उनकी सिबिल हिस्ट्री एक्सेसेबल नहीं है। कई तो सर्किल चेंज करके शादीशुदा से वापस कुंवारे भी बन जाते हैं..
खैर.. नया सर्किल, नये पड़ोसी, नये मोहल्लेवालों, नये कलीग्स, नये बॉस के साथ उसे अपना व्यवहार/स्कोर जीरो से शुरु करना पड़ता है, हर नए मिलने वाले आदमी के सामने उसे फिर से खुद को प्रूव करना पड़ता है, ज़ीरो से। इस प्रोसेस में दो चार साल यूं ही निकल जाते हैं लोगों की कसौटी पर परखे जाने में, भरोसा हासिल करने में। अपनी अच्छाई, अपने टैलेंट को उनके सामने प्रूव करने में। और जब तक 5-10 लोगों की नजर में उसकी कोई रेटिंग बनती है, या तो उसको और कहीं शिफ्ट होना पड़ जाता है या फिर उन 5-10 लोगों में से सब इधर उधर तितर बितर (ट्रांसफर वगैरह) होते रहते हैं। सब मेहनत व्यर्थ।
इसीलिए शहरों में कोई अच्छा आदमी या बुरा आदमी नहीं है, क्योंकि किसी के पास किसी की Data History (CIBIL) ही उपलब्ध नहीं है। बिना सिबिल के कोई किसी पर भरोसा नहीं करता है। सब ‘टकै सैर भाजी, टकै सैर खाज़ा’ है। अच्छाई का कोई रिवॉर्ड भी नहीं है, ना ही वो आपके सिबिल स्कोर में एड हो रही है, ना ही कोई ट्रस्ट जनरेट कर पा रही है। आप पिछले साल जिस मोहल्ले में रहते थे वहां आपने बहुत बड़ा अच्छाई का काम किया होगा लेकिन अब आप जहां रहते हैं वहां यह किसको पता है? इसलिए शहर के लोग “अच्छा आदमी” होने की कोशिशें छोड़ चुके हैं, क्योंकि अच्छा आदमी बनने के लिए बरसों की गई सारी कवायद घर शिफ्ट करते ही शून्य हो जाती है।
देखना तुम एक दिन सारे शहर ऐसी सिबिल व्यवस्था के अभाव में ‘अच्छाई शून्य’ हो जाएंगे। बचेंगे तो वही सर्किल जंप करते हाज़ी लोग।

