कोठी हवामहल सी गांव में

किसी ने पूछा है कि ‘कोठी हवामहल सी’ गाने का थॉट कैसे आया?

शायद लगभग 2013 की बात है मुंबई की। मैं काम की तलाश में बॉलीवुड के एक बड़े डायरेक्टर के ऑफिस जा रहा था काम मांगने के लिए। मैं मुंबई में नया नया ही था और आराम नगर (जहां उनका ऑफिस था) की तरफ पहली बार ही जा रहा था। साथ में एक रूममेट जो कि एक्टर था वो नासिक से था तो उसको मुंबई की काफी जानकारी थी, उसने बताया कि आराम नगर बहुत वीआईपी इलाका है और उधर सब बंग्लो ही बंग्लो हैं, सब अल्ट्रा रिच लोग रहते हैं उधर। ऑफिस का जो एड्रेस हमारे पास था, उसमें लिखा भी था बंगला नंबर फलाणा फलाणा, आराम नगर 2..

हम गांव वालों की परिभाषा के हिसाब से बंगला कोई बहुत बड़ा 5-7 बीघा में बना घर होता है। मतलब हम को बंगले का नाम सुनते ही बर्किघम पैलेस जैसा कुछ इमेजिन होता है। तो मैं नया नया पहली बार मुंबई आया हुआ आदमी, बहुत सारे बंगले देखने के लिए एक्साइटेड। हम आराम नगर पहुंचे तो वहां भाईसाहब ऐसे सड़कें वड़कें भी ढंग की नहीं और ग्रामीण एरिया जैसा सा ही फील आने लगा। मैंने कहा भाई अपन गलत एड्रेस पर आ गये लगता है, यहां कहां बंगला होगा। ऐसे करते करते हम बताए हुए एड्रेस पर पहुंच गये। वहां हम बंगला नंबर फलाणा फलाणा ढूंढने लगे। मैं चारों तरफ देख रहा कि भाई पक्का गलत जगह आ गये, यहां तो कोई बंगला नहीं दिख रहा दूर दूर तक। दोस्त ने बाहर लगी नेम प्लेट पर बंगला नंबर मैच करके कहा कि अपन सामने तो खड़े हैं बंग्लो के (शहर में बंगला नहीं बंग्लो बोला करते हैं)। मैंने चारों तरफ देखा कि कहां? यहां तो सब मकान ही मकान हैं। तो उसने कहा कि यह जो सामने मकान है यही है। मैंने कहा भाई छोटी गंगा बोलकर नाले में कूदा दिया, एड्रेस में बंगला लिखा था यह तो नॉर्मल घर ही है। दोस्त बोला यार बंग्लो ही तो है। मैंने परेशान होकर पूछा कि तू बंगले की तेरी परिभाषा तो बता। उसने समझाया कि जो बिल्डिंग में हवा में बने हुए होते हैं वो फ्लैट्स होते हैं मिडिल क्लास के, और जो जमीन पर बने हुए घर होते हैं वो बंग्लो होते हैं। जमीन कितनी महंगी है, जमीन पर मकान बनाना हर कोई अफोर्ड नहीं कर पाता।

मैं एकदम हैरान, परेशान। एक जोरदार ‘ज्ञान की चोट’ प्राप्त हुई। गौतम बुद्ध की तरह ज्ञान प्राप्त हुआ, जैसे बुद्ध को बोधिवृक्ष के नीचे हुआ था। मैं बोला भाई अगर यही बंगला है फिर तो हमारे गांव में तो किसी के पास फ्लैट है ही नहीं, सबके बंगले ही हैं खुद की जमीन पर बने हुए। और ये जो नामचीन डायरेक्टर हैं जिन्होंने 20-25 साल बाद यह बंगला हासिल किया है यानी कि मैं भी अगर 20 साल बाद बड़ा डायरेक्टर बन भी गया तो (“अगर” बन गया तो) मेरे पास भी ऐसा ही बंगला होगा। जबकि ऐसा तो मैं अभी गांव में छोड़कर आया हुं, गांव में सबके पास हैं। यही अगर बंगला है तो फिर भाई हमारे वाली तो कैंचो कोठियां हैं कोठियां, इसकी साइज के तो बरामदे और गाय भैंस के छपरे हैं गांव वालों के।

खैर वहां काम नहीं मिला, लेकिन उस दिन रिजेक्शन का ज्यादा दुख नहीं हुआ, मुंबई आने का हुआ। उस दिन कुछ लाईनें लिखी थीं अपनी मनोस्थिति पर, जो कि हिंदी में थी लेकिन उनका भाव यही था कि ‘क्यूं हु रयो लापालोप, कोठी हवामहल सी गांव म’। अभी उनको राजस्थानी में कन्वर्ट करके गाना बना दिया। और भी कुछ आने वाले गाने हैं जो इसी तरह 5-10 साल पुराने अनुभवों पर लिखे हुए हैं।

#Kothi_HawaMahal_Si

▶ सुनिए — Kothi HawaMahal Si

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