पर्सनल लॉ बोर्ड
भारतीय संविधान चूंकि हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है। इसलिए अपने इस अधिकार का इस्तेमाल करते हुए कल रात को मैंने अपना नया धर्म बनाया है। मेरी फिल्म अब तक रिलीज हुई नहीं है जिसकी वजह से अखबार में छपवाने के लिए फिलहाल पैसे नहीं है तो एतदद्वारा फेसबुक पर ही घोषणा करनी पड़ रही है। जय श्री राम, जय मीम और जय भीम के पहले से बुक हो जाने की वजह से मैंने अपना स्लोगन ‘जय श्याम’ रखा है, उम्मीद है आप सबको पसंद आया होगा। नहीं भी आया तो अपनी ऐसी तैसी करवाओ स्लोगन तो यही रहेगा। मैं फ्रांस के लुई चौदहवें का फैन हुं और मेरे धर्म में मेरी इच्छा ही कानून है। तो जैसा कि स्वभाविक है और नैतिक भी, निर्विवादित रूप से अपने धर्म का ईश्वर/अल्लाह मैं खुद ही हुं। लेकिन मेरे धर्म में पैगम्बर की पोस्ट फिलहाल खाली है जिसके लिए आवेदन आमंत्रित हैं, पद के लाभ और इन्कम शायद बताने की आवश्यकता नहीं है। इच्छुक अभ्यर्थी अपना बायोडाटा मुझे मेल कर सकते हैं। लोगों को सूतिया बनाने के अनुभवी कैंडिडेट को प्राथमिकता दी जाएगी।
इतिहास के हर महापुरुष पर पहले से चल रहे विभिन्न दावों और झगड़ों को मद्देनजर रखते हुए किसी भी महापुरुष की अनुपलब्धता की वजह से मेरे धर्म के महापुरुष का जिम्मा भी मैंने खुद के ही नाजुक कंधों पर उठाने का निश्चय किया है। और यह कोई नई बात भी तो नहीं है, जिस तरह बादशाह अकबर अपना खुद का धर्म दीन-ए-इलाही चलाकर महान हुए थे, उसी प्रकार मैं भी कल रात से महापुरुष का रूप धारण कर चुका हुं। तो अब चूंकि कल रात से मैं साक्षात् ईश्वर/महापुरुष हुं, मुझ पर या मेरे धर्म पर किसी ने भी टिप्पणी की तो मैं धार्मिक भावनाएं आहत करने का केस ठोक कर अंदर करवा दूंगा।
फिलहाल इस धर्म को मानने वाला मैं एकमात्र नागरिक हुं तो निश्चित है कि मैं अल्पसंख्यक हुं। तो जब मैं अल्पसंख्यक हुं तो संविधान के अनुसार बहुसंख्यकों को मेरे लिए नियम बनाने का अधिकार नहीं है (यकीन न हो सबसे बड़े कानूनगो सिब्बल साब से पूछ लो)। तुम बहुसंख्यक रखो अपना देश और संविधान, पुलिस-कानून अपने पास, तुमने 2 वर्ष 11 मास 18 दिन और 64 लाख रुपये बर्बाद करके मुझ पर कोई एहसान नहीं कर दिया है। मुझे कमजोर समझने की गलती मत करना, मैं भले ही अल्पसंख्यक हुं लेकिन दम इतना है कि 15 मिनट पुलिस हटाकर देखो तुम बहुसंख्यकों का नामोनिशान मिटा दूंगा इस देश से। थोड़े लिखे कोे ज्यादा समझना, अभी से बताय दे रहा हुं कि मैं तुम्हें संविधान की आड़ में अपने धार्मिक मामलों में दखलंदाजी नहीं करने दूंगा। अपने को अपना पर्सनल लॉ बोर्ड चाहिए बस, इससे कम कुछ भी मंजूर नहीं। आज से मैं खुद तय करुंगा कि मुझे कितनी शादियां करनी है और कितने तलाक। मेरे लिए Torrent downloading से बैन हटना चाहिए तुरंत। ये मेरे सर्वांगीण विकास के लिए अतिआवश्यक तो है ही, साथ ही मेरी आस्था का विषय भी है। और अपनी आस्था पर हमला मैं हरगिज बर्दाश्त नहीं करुंगा। बाकी के पर्सनल लॉज की भी मैं लिस्ट बना रहा हुं, बनते ही घोषणा कर दूंगा।
इसमें ना तो कुछ गैर संवैधानिक है और ना ही कुछ गैर वाजिब। 70 वर्षों से जब बाकी अल्पसंख्यक धर्मों को पर्सनल लॉ बोर्ड की सुविधा मिल रही है तो मेरे अल्पसंख्यक धर्म को क्यों नहीं?
धर्म का नाम मैंने खुद नहीं तय किया है। उसके लिए मेरे अनुयायी pollcode वेबसाइट पर वोटिंग करवा लेंगे भविष्य में। आखिरकार धर्म में कुछ कंट्रोवर्सी भी तो होनी चाहिए जिस पर कि बाद में अनुयायी एक दूसरे का या दूसरों का खून बहा सकें। आजकल कंपीटिशन के युग में कंट्रोवर्सी के बिना फिल्म तक नहीं चलती धर्म कैसे चलेगा? और धर्म का तो वैसे भी ट्रैक रिकॉर्ड रहा है कि धर्म का फैलाव बहाये गए खून का समानुपाती होता है।
जय श्याम।