राजपूत युवा
सबसे पहले तो यह कि कल जो संजय लीला भंसाली के साथ जयगढ में मारपीट हुई उसका मैं विरोध करता हुं। भंसाली जी या किसी भी अन्य की अभिव्यक्ति की आजादी का मैं सम्मान करता हुं। कल हुई घटना आपको शायद एक आम विरोध/आक्रोश प्रदर्शन की घटना नजर आती हो, लेकिन मेरे लिए उस पर आई राजपूत युवाओं की प्रतिक्रियाएं उस घटना से कहीं ज्यादा चिंतनीय हैं। प्रतिक्रियाएं जानने के साथ ही कल जो हुआ वो क्या था और क्यों हुआ, उसे भी गहराई से समझना आवश्यक हो चला है। मुझे लगता है कि कल जो हुआ वो शुरुआत भर थी… सिर्फ़ एक ट्रेलर था, आगे शायद फिल्म इससे बहुत भयानक होगी।
अत्यंत दुखी मन से मुझे यह कहना होगा कि राजपूत युवा इस समय एक बम बना हुआ है, बिना बत्ती का, बिना रिमोट का… कब, कहां, किस पर फूट पड़े कोई अंदाजा नहीं। वो घुटा हुआ महसूस कर रहा है, वो फटना चाहता है। उसे नहीं पता कि उसे कहां फटना चाहिए और कहां नहीं, उसे नहीं पता कि उसके फटने का क्या परिणाम होगा, खुद उस पर, समाज पर, देश पर। आज भंसाली पर फूटा है कल को इससे भी भयानक और विस्फोटक रूप से किसी और पर फूट सकता है, फूटेगा।
आप रोकना चाहते हैं? तो आपको पहले समझना होगा कि ऐसा क्यों है?
ऐसा इसलिए कि उसके पास और विकल्प नहीं बचा है। वो कुंठित है, उपेक्षित है… हर तरफ से। उसे लगता है कि उसकी कहीं कोई सुनवाई नहीं है, उसका भविष्य-इतिहास सबकुछ तहस-नहस किया जा रहा है। यह देश उससे समझदार होने की उम्मीद तो करता है लेकिन उसे समझदार बनाने की कोशिश नहीं करता, व्यवस्था नहीं करता। आप उससे उम्मीद करते हैं कि वो विचारों द्वारा विरोध करे हिंसा द्वारा नहीं, लेकिन आप इस बात की कभी परवाह नहीं करते कि उसे विचारों द्वारा विरोध करने लायक बनाया कब आपने? Right To Education में से उसका पत्ता काटकर आपने उससे उसका शिक्षा का अधिकार छीन लिया। 95% लाने पर भी आपने उसे कॉलेज में एड्मिशन नहीं दिया जबकि कुछ 30-40% लाने वालों को आप फ्री शिक्षा, फ्री कोचिंग के अलावा छात्रवृति के नाम पर पॉकेट मनी तक बांटते हैं। बिना सरकारी सहायता के खुद अपनी मेहनत से 80% लाने के बाद भी आपने उसे नौकरी नहीं दी। जो नौकरी लग भी गए हैं तो उन्हें डर है कि कब प्रमोशन में भी आरक्षण आ जाएगा पता नहीं। जो काबिल होते हुए भी सरकारी नौकरी ना लगा वो डरता है कि पता नहीं कब प्राइवेट सेक्टर में भी आरक्षण लागू हो जाएगा। उसकी पूरी जिंदगी ही डर बनकर रह गई है और डरा हुआ आदमी खतरनाक होता है। रोहित वेमुला की आत्महत्या पर आप खून के आंसू रो पड़ते हैं, आरक्षण से हो रही आत्महत्याओं पर कब रोए थे आप? आप उस युवा से कानून व्यवस्था पर भरोसा रखने को कहते हैं जो पैदा हो कर ओवरएज हो गया 1991 से ये सुनते सुनते कि उसे भी अब आर्थिक आधार पर आरक्षण दिए जाने का प्रस्ताव संसद में आ गया है, जल्दी ही मिल जाएगा। आपने उसे तो 26 साल तक बेवकूफ बना दिया बहला-फुसलाकर लेकिन अब वो अपने बेटे को कैसे बहलाए कानून पर भरोसा रखने के लिए? आप उस युवा से उस संविधान में विश्वास रखने की उम्मीद करते हैं जो संविधान उससे लोकसभा की 543 में से 119 सीटों तथा विधानसभा की लगभग 25% सीटों पर चुनाव तक लड़ने का हक छीन लेता है। आप उससे उस न्याय व्यवस्था पर भरोसा रखने की उम्मीद कर रहे हैं जिसमें एक तरफ़ छुआछूत और जातिसूचक गालियों के झूठे केसों में अनगिनत युवाओं की जिंदगियां बर्बाद हुई हैं, वहीं दूसरी तरफ सलमान भाई हर महीने बाईज्जत बरी होने के लिए कोर्ट पधारते हैं। जरा दिमाग पर जोर डालिए तो आखिरी बार किस बड़े आदमी को सजा हुई थी?
आप उस युवा से उन सरकारों से उम्मीद रखने को कहते हैं जिन सरकारों के लिए वो देश में exist ही नहीं करता। सरकार की सारी योजनाएं, सुविधाएं, वजीफे, योजनाएं या तो अल्पसंख्यकों के लिए होती हैं या फिर दलितों की लिए। सामान्य के लिए सरकार की आखिरी योजना कौनसी थी याद कीजिए जरा फिर से एक बार दिमाग पर जोर डालकर। पूर्व प्रधानमंत्री जी कहते थे कि देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है, वर्तमान प्रधानमंत्री जी कहते हैं कि देश के संसाधनों पर हक दलितों का है क्योंकि यह देश तो अंबेडकर का है। तो फिर कैंचो हम कहां बांग्लादेश जाएं? बार बार उसे इस देश में दोयम दर्जे का नागरिक होने का अहसास करवाया जा रहा है, देश की एकता के नाम पर उसे आरक्षण के भेदभाव को चुपचाप सहन करने के लिए कहा जा रहा है। उसके दिल में बार बार सवाल उठता है कि जिनको हर जगह आरक्षण चाहिए वो सीमा पर गोलियां खाने में आरक्षण क्यों नहीं मांगते? जो रोज देश की जातिगत जनगणना के आंकड़े मांगते हैं वो फौज के जातिगत आंकड़े क्यों नहीं मांगते? जब हर अखबार, चैनल पर बलात्कार की शिकार लड़की की जाति होती है तो फिर सेना में मरने वाले शहीद की जाति क्यों नहीं होती कैंचो?
राजपूत युवा रियासतें वापस नहीं मांग रहा है, वो राजतंत्र वापस नहीं मांग रहा है, वो खुद के देश में लोकतंत्र में अपने लिए बराबरी का हक मांग रहा है। क्योंकि उसे ज्ञात है कि उसके पूर्वज राजा नहीं थे। शायद आपको भी पता होगा कि सभी राजपूत राजा नहीं थे, हर राज्य के एक राजा को छोड़कर बाकी सब आम राजपूत थे। फिर भी आपके हिसाब से सभी राजपूत अत्याचारी, शोषक और अमरीश पुरी थे। आपने शायद भाले लिये खड़े, बंदूकें लिये खड़े सैनिक नहीं देखे, आम राजपूत वो थे जनाब। खैर आपकी क्या गलती इस देश का संविधान भी मानता है कि सभी राजपूतों के पूर्वज राजा थे, इसलिए वो सब पैदाईशी रईस हैं इसलिए उन्हें किसी सुविधा, सहायता, शिक्षा, रोजगार, योजना की आवश्यकता नहीं।
वैसे तो लिखने को बहुत कुछ है… पर कई बार मानवाधिकारों की बात करते भी सुना है मैंने आपको। नक्सलवादियों, आतंकवादियों तक के मानवाधिकारों तक की चिंता करते हैं आप, कश्मीर से लेकर सीरिया-बर्मा तक पहुंच जाते हैं कई बार तो, इस देश के सामान्य युवा के तो मानवाधिकार होंगे नहीं शायद? या वो मानव ही नहीं आपके हिसाब से? 96% लाकर उसे कॉलेज में एडमिशन लेने का अधिकार है या नहीं आपके मानवाधिकारों के तहत? या फिर वो बंदूक उठाएगा तब आप उसे मानव मानेंगे?
वैसे आज भंसाली को दो थप्पड़ पड़ने पर वो कई सालों बाद पहली बार खुश है। उसे लगता है कि अब वो फिल्मकारों का सॉफ़्ट टारगेट नहीं रहेगा, अब फिल्मकार उसके बारे में उल्टा सीधा बनाने से पहले कई बार सोचेंगे जैसे वो मुसलमानों पर बनाने से पहले हजार बार सोचते हैं। वो खुश है कि पहली बार एक ऐसे बंदे को जिसे वो अपना प्रतिनिधि कह सके मीडिया ने अपनी राय रखने के लिए बुलाया है। लेकिन मुझे इस खुशी ने आज चिंतित कर दिया है। जहां तक मेरी नजर पहुंचती है मैं एकमात्र राजपूत नजर आता हुं (अनुराग कश्यप के अलावा) जो इस घटना का विरोध कर रहा है और बाकी युवाओं को समझाने की कोशिश कर रहा है कल शाम से। लेकिन कोई समझने को तैयार नहीं है। मैंने आज कईयों को पूछा कि क्या यह सही था? इससे हासिल क्या हुआ? लोगों को फोन और सोशल मीडिया पर गालियां बकने से क्या हासिल होगा? ऐसी बेवकूफियों से फिल्म बंद थोड़ी हो जाएगी? सभी का एक ही जवाब मिला कि तुम अपना सही गलत अपने पास रखो, हमें अब फर्क नहीं पड़ता सही गलत से। फिल्म तो बंद कैसे भी नहीं होनी थी, ना ज्ञापनों से, ना कोर्ट से, ना विरोध से… लेकिन आज कलेजे को ठंडक जरूर पड़ गई। घुट घुट कर रोज मरने से बेहतर सामने वाले को मारकर मरो, जिंदा तो वैसे भी नहीं हो।
इस मनोस्थिति का युवा घातक होता है, वो इस्तेमाल के लिए तैयार होता है। किसी के भी द्वारा उसकी दुख्ती रग दबाकर उसे वैचारिक गुलाम बनाया जा सकता है, क्योंकि उसके लिए सही-गलत के मायने खत्म हो चुके होते हैं, वो किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार होता है। वो डरा हुआ असुरक्षित महसूस कर रहा युवा विभिन्न दलों-सेनाओं का आसान शिकार होता है, किसी भी सिरफिरे नेता के लिए उसे भड़काकर उस बम का रिमोट कंट्रोल पाना आसान हो जाता है। मानसिक दिवालियेपन की स्थिति में है वो, आप भी तीन बार ‘जय राजपुताना’ बोल दीजिए, वो आपके पीछे हो जाएगा कुछ भी करने के लिए। कोई भी उसे चार बातों से आक्रोशित करके उसकी अक्ल निकाल सकता है। यह सब मैं इसलिए जानता हुं कि पिछले कुछ समय में कईयों की अक्ल निकलते करीब से देखी है मैंने, जो कभी मुझे हिंसा के दुष्प्रभाव समझाया करते थे आज वो मुझसे ही भंसाली पर हमला करने वालों के पक्ष में बहस कर रहे हैं कि यही एकमात्र रास्ता बचा है। व्यक्ति की उम्मीद खत्म हो जाने से ज्यादा निराशाजनक और चिंताजनक कुछ भी नहीं। खासकर उसके आस पास के लोगों के लिए।
और ये हाल-ए-दिल सिर्फ़ हर राजपूत युवा का नहीं, बल्कि हर सवर्ण युवा का है। उसके दिल में ‘गुलाल’ फिल्म का वो डायलॉग बार बार गूंजता है कि लोकतंत्र के नाम पर हमारे साथ सिर्फ़ धोखा हुआ है। आप तमाम क्यूटियापे के तर्क दीजिए आरक्षण के पक्ष में, उसे नहीं मंजूर। वो फटेगा कभी ना कभी। जबरदस्त फटेगा। फटने के बाद ईलाज ढूंढने से बेहतर है कि पहले सुधार किए जाएं।
जिंदगी मौत ना बन जाए संभालो यारों…
(घनश्याम सिंह ओड़ींट)
