जीवन का उद्देश्य
एक बड़ा ही फेमस सवाल है कि “हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है?” इस सवाल के कुछ प्रचलित चौमूं टाईप के जवाब भी मौजूद हैं। जैसे कि सत्य को खोजना, ईश्वर को प्राप्त करना, मोक्ष/स्वर्ग प्राप्त करना आदि।
सबसे पहले सत्य से शुरु करते हैं। सत्य को खोजना मात्र एक छलावा है खुद को बहलाने का। क्योंकि ना तो सत्य जैसी किसी चीज का ब्रह्मांड में अस्तित्व है और ना ही हम डिटेक्टिव नियुक्त किए गये हैं जो सत्य को खोजते फिरें। और खोजें भी तो किस किस बात के बीच छिपे सत्य को खोजें, जितने फेसबुक पर दद्दा नहीं है उससे ज्यादा तो हर बात के पीछे छिपे सत्य और सत्य के वर्जन हैं। हर व्यक्ति के अपने अपने सत्य, उन सत्यों में से कौनसा सत्य वास्तव में सत्य है, ये तय ही कौन कर सकता है? दरअसल सत्य सिर्फ एक नजरिया है, भ्रम है। जैसे हम किसी भी बिंदु को धरती का सेंटर पॉइंट मान लें वही धरती का सेंटर पॉइंट है, वैसे ही जिस चीज/बात को हम सत्य मान लें वही सत्य है जबकि the truth is, nothing is the truth. इसलिए जो आपको ठीक लगे उसे ही सत्य मान कर टंटा खत्म कीजिए।
उसके बाद नंबर आता है मोक्ष/स्वर्ग का। तो मैं पूछता हुं कि यहां धरती पर अब ऐसी क्या कमी रह गई है जो हम मोक्ष के पीछे पगलाए घूमें? आज से हजारों वर्ष पहले जब मोक्ष की स्थापना की गई होगी तब भले ही मोक्ष तत्कालीन दुनिया से बहुत एडवांस था, जैसे आज की दुनिया से काफी एडवांस “ब्लैक पैंथर का Wakanda साम्राज्य” है। लेकिन मोक्ष/जन्नत में जिन सुविधाओं को देने का चुनावी वादा तब से किया जा रहा है उनसे सैंकड़ों गुणा बेहतर सुविधाएं यहां पृथ्वी पर आज यथार्थ में उपलब्ध हो चुकी हैं। तो फिर क्यों हम स्वर्ग के 56 भोग के चक्कर में यहां की शादियों के टेंट में लगे 112 तरह के पकवान मिस करें? इच्छुक लोगों के लिए 72 की बजाय 7200 से भी ज्यादा हूरों की व्यवस्था बैंकॉक जैसी जगहों पर करवाई गई है। जो मात्र 40-50 हजार रुपये में चार दिन-तीन रात के पैकेज में उपलब्ध है तो फिर इन हूरों के लिए मरने की क्या आवश्यकता है? स्वर्गलोक में उड़ने वाले अश्व हैं, जिनसे तेज तो हमारे यहां की बुलेट इनफील्ड चलती है या फिर जेट एयरवेज बंद होने के बाद भी जो 5-7 एयरलाइंस बची हुई हैं आप उनमें उड़ सकते हैं। इसके अलावा स्वर्गलोक में उद्यान, पुष्प लगी हुई सुंदर मनोरम सीढियां, पुष्प वर्षा, फव्वारे जैसी छोटी मोटी लग्जरीज हैं जो कि हम यहां भी शादियों में टेंट वाले को हजार दो हजार रुपये एक्सट्रा देकर लगवा सकते हैं।
बल्कि आज जो इस पृथ्वीलोक में लग्जरीज मौजूद हैं, और जो अगले 40-50 सालों में यहां उपलब्ध होने वाली हैं, उनके मुकाबले स्वर्गलोक वाली घोषणाएं कुछ भी नहीं हैं। ना तो वहां मनोरंजन के लिए IPL की व्यवस्था है और ना ही चुनाव। मैंने किसी भी शास्त्र या पुराण में नहीं पढा कि वहां Facebook, Ola, Swiggy, BookMyShow जैसी अत्याधुनिक ऑनलाईन सुविधाएं उपलब्ध हों। सोचिए वाट्सएप वाले फूल पत्ती गुड मॉर्निंग मैसेजेज के बिना कैसे नींद खुलेगी आपकी वहां पर? सच्चाई तो यह है कि डेवलपमेंट के मामले में स्वर्गलोक इस मृत्युलोक से पिछड़ चुका है और अभी तो यहां मोदीजी के दो कार्यकाल बाकी पड़े हैं। इसलिए स्वर्ग को तलाशना कैंसिल। आगे बढते हैं।
इधर कथा-भागवत बांचने वालों ने अलग गदर मचाया हुआ है कि बाकी सब छोड़ कर हर वक्त ईश्वर का स्मरण करो, उसका नाम जपते रहो। उसे खुश करने के लिए तरह तरह की नौटंकी करो तब जाकर तुम्हें वो “मिलेगा”। इसलिए पैदाईश से कथाएं सुनती आ रही इस दुनिया का सबसे प्रचलित जवाब है कि जीवन का लक्ष्य है “ईश्वर को ढूंढना”।
क्यों ढूंढना है भई ईश्वर को? ईश्वर ने कौनसा तुमसे कुछ उधार लेकर अपना फोन स्विच ऑफ कर लिया है जो उसे ढूंढना है। वैसे भी अगर ईश्वर जैसी कोई चीज वाकई में है तो फिर उसने ही तो हम सब को बनाया है। फिर कुछ नया ढूंढो ना, वापस ईश्वर को ढूंढने का क्या फायदा? अगर वो सच में चाहता कि तुम उसे ढूंढकर उसके पास जाओ तो तुमसे पीछा छुड़ाकर तुम्हें इस मृत्युलोक में भेजता ही क्यों, वहीं अपने पास ही रख लेता? और मान लो ईश्वर अगर छुपमछुपाई खेल रहा है, उसे इसमें मजा आ रहा है इसलिए उसने यह सारी “लीला” रची है तो तुम उसे ढूंढने की बजाय क्रिकेट, फुटबॉल, टेनिस खेलने की लीला रचा लो और मौज करो, उसे छिपा हुआ बैठे रहने दो। क्या करोगे ईश्वर के पास जाकर? ऐश करो, मस्त रहो यहां। वो भी कोई अवतार ले लिवा कर यहीं धरती पर आकर सेटल हो जाएगा थोड़े दिनों में, अगर कोई ढूंढेगा नहीं तो।
इन फेमस जवाबों के अलावा आजकल जीवन के कुछ नये उद्देश्य भी मार्केट में आए हैं। जैसे कि सफल होने आए हैं, इतिहास बना कर नाम अमर करने आए हैं इस जीवन में वगैरह वगैरह..
तो सफलता से शुरु करते हैं। सफलता बहुत ओवररेटेड चीज है। दरअसल ना तो कोई भी सफलता सारी “सफलताओं” का ऊपरी हासिल है और ना ही कोई सफलता परमानेंट है। सफलता हासिल करके जैसे ही बंदा आगे की तरफ देखता है तो उसे दिखाई देता है कि उससे कई गुणा सफल लोग आगे लाईन में खड़े हैं, उसी क्षण उस सफलता की खुशी गायब हो जाती है और वो फिर अगली सफलता की तरफ दौड़ पड़ता है। पूरी जिंदगी को मोटिवेशनल स्पीकर्स के कहे अनुसार झंड करके 2-4 बार कुछ क्षण के लिए खुद के सफल होने जैसी फीलिंग मिल भी जाती है तो ये घाटे का ही सौदा है।
इतिहास बनाना मुझे इसलिए भी फालतू लगता है कि जब तक ये इतिहास बनेगा तब इस इतिहास को पढने के लिए हम तो बचेंगे नहीं वैसे भी, तो क्या फायदा ऐसी चीज बनाने का जो अपने कुछ काम ही ना आए?
तो फिर वाकई जीवन का उद्देश्य है क्या?
मैं कहुंगा कि जीवन का कोई उद्देश्य नहीं है। जीवन पूर्णतया निरुद्देश्य है। जीवन एक ऐसी पिकनिक की तरह है जिसमें हमें पता नहीं है कि हम कहां से आए हैं, क्यों आए हैं, कहां जाना है, कब जाना है? तो ऐसी पिकनिक में हमें क्या करना चाहिए? एंजॉय करना चाहिए या डिटेक्टिव बन कर ऊपरी सवालों के जवाब ढूंढने में पिकनिक खराब करनी चाहिए?
जीवन एक पिकनिक है बस, और कुछ नहीं। हम कुछ समय पृथ्वी पर बिताने पधारे हैं बस, थोड़ा “टाईम स्पेंड” करने आए हैं यहां। “कहां से आए हैं कहां जाएंगे” का फालतू लोड लेने की बजाय क्वालिटी टाईम स्पेंड कीजिए यहां। ना तो आप यहां अपने धर्म को डिफेंड करने के लिए पैदा हुए हैं, ना अपनी जाति/पार्टी के कैंडीडेट का फेसबुक पर चुनाव प्रचार करने के लिए। और पैसे कमाने के लिए तो हरगिज नहीं। इसलिए इनमें मत उलझिए। बस मजे लीजिए, एंजॉय कीजिए..
मस्त रहिए, जो करना चाहते हैं कीजिए… it’s your life, don’t make it large, make it worth-living.
