पैसे की दौड़
रैयतवाड़ी, महलवाड़ी व्यवस्था, स्थायी प्रबंधन का नाम पढा सुना होगा हमने आठवीं दसवीं की सामाजिक ज्ञान की किताबों में? उस पर बाद में आएंगे। पहले यह कि अगर आप कभी गांव में रहे हैं तो आपने जरूर सुना होगा हमारे पूर्वजों से कि उस जमाने में 4 आन्ने यानी 25 पैसे में शादियां हो जाया करती थीं।
चार आन्ने में शादियां कैसे होती थी वो जरूर स्टडी का विषय है, उस पर बात करते हैं। दरअसल हम जैसा आज अपने समाज को देखते समझते हैं, वैसा था नहीं यह कुछेक समय पहले तक। आज से कुछ पीढी पहले तक हर गांव अपने आप में एक “सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था” होती थी, पूर्णतया आत्मनिर्भर और स्व-संचालित अर्थव्यवस्था। मतलब गांव के लोगों के लिए जीवन हेतु आवश्यक हर वस्तु गांव में ही उपलब्ध होती थी, उपलब्ध क्या उत्पादित होती थी। उन्हें गांव से बाहर जाना ही नहीं पड़ता था किसी भी चीज के लिए, बाहर से कुछ भी इम्पोर्ट नहीं करना पड़ता था। या यूं समझ लीजिए कि उन्होंने खुद की जीवनचर्या को ऐसे डिजाइन कर रखा था कि उन्हें ऐसी किसी चीज की जरूरत ही नहीं होती थी जो कि उनके गांव में उत्पादित ना हो। मसलन तब वो चाय नहीं बल्कि छाछ/लस्सी पीया करते थे जो कि आसाम के बागानों से चुनने की बजाय उनकी गायों/भैसों से सहज प्राप्त होती थी, स्लीपर्स नहीं जूती पहना करते थे जो गांव का मोची बनाता था बाटा/लखानी के शोरूम से खरीदनी नहीं पड़ती थी, खाने का अनाज वो खुद ऊगाते थे उन्हें पारले-जी, KFC की लोड नहीं थी, मनोरंजन के लिए टीवी नहीं कब्बडी, गिल्ली डंडा, सतोलिया, मालदड़ी टाईप बिना इक्विपमेंट्स के खेल हुआ करते थे। फोन, मोबाइल जैसे संचार के साधनों की आवश्यकता इसलिए नहीं होती थी कि गांव के बाहर उनका कोई रहता ही नहीं था। मतलब गांव अपने आप में पूरी दुनिया हुआ करती थी, जिससे बाहर जाने की नौबत नहीं आती थी। अधिकतर गांव से बाहर वो लोग अपने जीवन में सिर्फ बारात लेकर ही जाते थे।
यह सब तो आप सभी जानते ही हैं, तो मेरा इन्हें बताने का पॉइंट क्या है? पॉइंट यह है कि तब उन्हें पैसों की जरूरत नहीं पड़ती थी क्योंकि उन्हें कुछ भी “खरीदना” होता ही नहीं था। चूंकि कुछ भी खरीदने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी तो पैसे होते भी नहीं थे लोगों के पास। किसी के पास 50-100 रूपये की जमापूंजी होना तो बहुत बड़ी बात होती थी, आज से तीन पीढी पहले (60-70 बरस पहले) तक के 3 रुपये 6 रुपये कर्जा लेने-देने के कई रुक्के (लोन एग्रीमेंट) मैंने खुद देखे हुए हैं, जैसे आज 30-40 लाख रुपये के होते हैं। यानी पैसे थे ही नहीं यहां।
पैसे नहीं थे का मतलब आज के संदर्भ में मत समझिए कि लोग भूखे-गरीब टाईप थे। उनके पास सबकुछ था पैसों के अलावा। आज हमें असंभव लगेगा कि लोगों के पास पैसे नहीं हों और फिर भी उनके पास सबकुछ हो, यह कैसे संभव है? तो यह कमाल था हमारे गांवों के सामाजिक ढांचे का। यहां बिना पैसे सबकुछ हो जाया करता था। किसान अन्न उपजाता था, किसान के दिए अन्न (लगान) के बदले में सैनिक उसे सुरक्षा देते थे, सैनिक द्वारा उसमें से कुछ अन्न मोची को देने पर मोची उसे जूती बनाकर दे देता था, मोची द्वारा जूती बनाए जाने के एवज में कारीगर उसके लिए झोंपड़ा बना देता था, जूती के एवज में जुलाहा उसे रजाई बनाकर दे देता था, जुलाहे की दी रजाई की एवज में नाई उसके बाल काट देता था, नाई के बाल काटने की एवज में किसान उसे अन्न (तिंवारी) दे देता था। यानी इस अनंत घूमते सर्किल में सबको उनके काम के बदले आवश्यकता की वस्तुएं मिल जाती थीं बिना पैसे के ही। (कभी गौर कीजिए कि हर गांव में आपको हर जाति के लोग मिलेंगे, नहीं होता था तो कहीं से लाकर बसाया जाता था, उसकी वजह यही थी) एक की जरूरत के बदले में दूसरे की जरूरत पूरी हो जाती थी बिना पैसे ही। तू मेरी बेटी की शादी में बान-बेस (कपड़े कन्यादान वगैरह) रखेगा, मैं तेरी बेटी की शादी में बेस-बान वापस रख दूंगा टाईप का कॉ-ऑपरेशन था। खेती के लिए पैसे दे कर मजदूर नहीं लाने पड़ते थे, लोग बारी बारी एक दूसरे का हाथ बंटा देते थे, आज तू मेरी फसल कटवाएगा कल मैं तेरी फसल कटवा दूंगा। अब सोचिए कि ऐसी व्यवस्था में पैसे की आवश्यकता ही कहां थी? गांव अपने आप में आत्मनिर्भर होता था और ‘वस्तुएं ही मुद्रा थी’, कागज के टुकड़ों की जरूरत नहीं थी। पैसों (नकदी) की जरूरत सिर्फ उसी चीज के लिए पड़ती थी जो कभी कभार किसी अजनबी व्यापारी से खरीदनी पड़ती थी, जो व्यापारी बाहरी होता था और पेमेंट के रूप में वस्तुएं (उस जमाने का पेटीएम) एसेप्ट नहीं करता था।
गांव में जो कुछ होता था सार्वजनिक था, जिसको जहां अच्छा लगे वहां झोंपड़ा बना लेता, खेती कर लेता, जमीन की कोई कमी तो थी नहीं। जो चीज अधिक मात्रा में होती है उस पर कब्जे के लिए कभी झगड़ा नहीं होता है, जैसे जीवन के लिए अति महत्वपूर्ण होने के बावजूद आज ऑक्सीजन के लिए किसी में झगड़ा नहीं होता। जैसे आज कोई यह नहीं कहता कि यह नदी मेरी है, यह महासागर मेरा है, यह सड़क मेरी है। उसी प्रकार तब जमीन किसी की पर्सनल प्रॉपर्टी होने का कॉन्सेप्ट यहां प्रचलन में नहीं था, जमीन सार्वजनिक होती थी। गांव भी स्थाई नहीं थे, कई बार अकाल पड़ने पर पूरा गांव अपने पशुओं (जो कि उनकी एकमात्र प्रॉपर्टी हुआ करते थे) को लेकर कहीं और शिफ्ट हो जाता था, जिसको जहां अच्छा लगा वहां झोंपड़ा बना लिया। ना कोई स्टाम्प, ना कोई रजिस्ट्री, ना कोई पट्टा। किसी की शादी होती, बारात आती तो गांव में से चारपाईयां इकट्ठी कर लेते थे, रजाई गद्दे इकट्ठे कर लेते थे टेंट की जरूरत नहीं होती थी, जिसकी भैंस दूध दे रही होती वो अपने आप दूध पहुंचा देते थे, वेटर का रोल सभी गांव वाले मिलकर पूरा कर लेते थे, क्योंकि चार महीने खेती करने के अलावा वो बिल्कुल भी बिजी नहीं रहते थे, टाईम ही टाईम होता था उनके पास। और शादी में वेटर की भूमिका स्वीकार करने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं होने की वजह थी कि सब लोग वैचारिक के साथ साथ आर्थिक रूप से भी एक समान ही थे। अमीर-गरीब का तो कॉन्सेप्ट ही नहीं आया था, ज्यादा से ज्यादा या तो एक गाय किसी के पास कम होती थी या किसी के पास दो बकरी ज्यादा होती थी, इससे ज्यादा आर्थिक असमानता नहीं थी। और इस आर्थिक समानता की वजह से कोई खुद को खुदा नहीं समझता था, घमंड वाला कॉन्सेप्ट भी नहीं था क्योंकि घमंड करें किस पर? कुछ था ही नहीं किसी के पास घमंड/दिखावा करने के लिए, सभी एक जैसे ही तो थे, किसी के भी पास स्कॉर्पियो नहीं थी। एकदम असली वाला ऑर्गेनिक साम्यवाद/समाजवाद था यहां, कार्ल मार्क्स के पैदा होने से पहले ही। वो भी चीन, रूस, क्यूबा की तरह थोपा हुआ नहीं, पूर्णतया प्राकृतिक। किसी की कोई पर्सनल प्रॉपर्टी नहीं, कोई आर्थिक असमनाता नहीं, 0% बेरोजगारी। सब एक समान, सब मस्त।
फिर 19वीं शताब्दी शुरु होते होते अंग्रेजों ने रैय्यतवाड़ी, महलवाड़ी, स्थायी प्रबंधन आदि Land Reforms किए। रिफॉर्म्स की बजाय उन्हें एक्सपरीमेंट्स कहना ज्यादा सही होगा। तो उन रिफॉर्म्स के परिणामस्वरूप पहली बार यहां जमीन के मालिक बनाए गये, कि यह इतना हिस्सा (खेत) इसका, उतना खेत उसका है। पट्टे बने, जमीन का मालिकाना हक लोगों को अंग्रेजों ने दिया कागजों में। क्यों? क्योंकि तब तक यहां लोग उतनी ही जमीन जोतते थे जितना अनाज उन्हें चाहिए होता था क्योंकि अनाज बेचने वाला सिस्टम नहीं था, हां उधार जरूर दे देते थे पींपा भरकर। तो कम जोतने की वजह से अंग्रेजों को लगान बहुत कम जमीन पर मिल पाता था। इसलिए मालिकाना हक के नाम पर दरअसल 5 बीघा जोतने वाले किसान के जिम्मेदारी गले डाली गई अंग्रेजों द्वारा कि यह 50 बीघा जमीन आज से तेरी है, इतनी जमीन का लगान तुझे देना ही होगा, चाहे तू जोत या मत जोत, 5 बीघा जोत या 25 बीघा लगान तो 50 बीघा का लगेगा। धीरे धीरे जमीन को खरीदना बेचना शुरु हुआ। लोगों में अधिकार का भाव पैदा हुआ, कि यह तेरा है, यह मेरा है। मेरे पास तेरे से ज्यादा है, तेरे पास मेरे से कम है। इससे लोगों के आपसी संबंधों में जो आत्मीयता थी, वो कम हुई। दिखावा शुरु हुआ, आपसी सहयोग (cooperation) के लिए बने सिस्टम्स (दहेज, कन्यादान, बान, नूता आदि) ने दिखावे और कम्पीटीशन का रूप ले लिया। दिखावे के लिए ही चाय, कॉफी, घड़ियां, विलायती कपड़े, जूते, सैंडल, टूथपेस्ट, साबुन आदि तत्कालीन अनावश्यक लेकिन सुख-सुविधाओं के सामान मार्केट में पैदा हुए। और ये ऐसे प्रॉडक्ट्स थे जो गांव में उत्पादित नहीं होते थे, इनको ‘खरीदना’ ही पड़ता था। इनको जो बेचने वाले लोग थे वो गांव वालों की वस्तुओं (अनाज, जूती, रजाई) के बदले में ट्रेडिंग नहीं करते थे, उन्हें अपने सामान की कीमत मुद्रा (नकदी) में चाहिए होती थी। इसलिए लोगों ने पैसों को इकट्ठा करना और महत्व देना शुरु किया, उन चीजों को खरीदने के लिए जो कि वो गांव में खुद उत्पादित नहीं कर सकते थे।
यहां से गांवों की अर्थव्यवस्था में पैसे की एंट्री होती है। अब गांव के लोग आपस में भी काम के बदले में वस्तुओं की जगह एक दूसरे से पैसे मांगने लगे। सभी कामों/चीजों की कीमत जो पहले (एक्सचेंज ऑफर में) लगभग एक समान थी वो अब उपयोगिता व उपलब्धता के आधार पर कम-ज्यादा होने लगी। जैसे बाजरा दस रुपये किलो ही रह गया और मूंगफली पचास रुपये किलो हो गई। नाई द्वारा कटिंग की कीमत पचास रुपये ही पहुंची, उधर जूती की कीमत पांच सौ रुपये हो गई। तो अब क्यों मोची अपने बाल कटवाने की एवज में नाई को जूती की जोड़ी बनाकर दे दे? इस प्रकार “वस्तु-विनिमय व्यवस्था” का बहुत तेजी से पूर्णतया उन्मूलन ही हो गया और नकदी प्रथा शुरु हुई। अब गांव में दुकान भी खुल चुकी थी (ज्यादा पुरानी बात नहीं है यह, अपने दादाजी से पूछिए उन्हें याद होगा कि गांव में पहली दुकान कब खुली थी।) गांवों की आत्मनिर्भर स्वतंत्र इकोनॉमी में सेंध लगी और बाहरी मार्केट ने गांवों में प्रवेश करके उनकी एक्जिस्टिंग ईकोनोमी को तहस नहस कर दिया।
पहले चूंकि सब लोग एक दूसरे पर निर्भर थे, तो समाज नामक व्यवस्था बहुत महत्वपूर्ण थी जिसके अवशेष आज भी मौजूद हैं। हर व्यक्ति को कुछ भी करने से पहले यह चिंता रहती थी कि इसके बारे में समाज क्या कहेगा, समाज क्या सोचेगा, समाज में मेरी प्रतिष्ठा का क्या होगा? समाज से अगर मुझे बहिष्कृत (न्यात से बाहर) कर दिया गया तो मेरा क्या होगा? वो समाज को बहुत अधिक महत्व देता था, क्योंकि उसका पूरा जीवन उस समाज पर ही निर्भर था। अगर उसे समाज से बाहर कर दिया गया तो कौन उसके बाल काटेगा, कौन जूती बनाएगा, कौन रजाई देगा, कौन उसकी फसल काटने में मदद करेगा? उसका तो जीवन ही असंभव हो जाता। इस वजह से लोगों के दिलों में यह डर पैदा हुआ कि समाज क्या कहेगा? लेकिन पैसों के आगमन से उनकी समाज पर निर्भरता खत्म हुई। अब वो पैसों से रजाई, जूती, अनाज सब कुछ दूसरी जगहों से मंगवा सकते थे तो उन्हें समाज की लोड नहीं रही। समाज नामक व्यवस्था दरकने के बाद संयुक्त परिवार एकल परिवार में बदले, एकल परिवार से फिर मां-बाप गायब हो गये, और फिर वर्तमान तक आते आते जीवनसाथी भी तलाक ले लिवा कर गायब हो गया, और इंसान अकेला रह गया अपने परिवार में। दरअसल अब उसके लिए अकेले जी पाना संभव हो गया है, जो कि कुछ समय पहले तक नहीं था। अब वोट लेने वालों को छोड़कर किसी को कोई लोड नहीं है समाज की, समाज को जो सोचना है सोचता घूमे। पैसों ने इंसान की किसी पर भी निर्भरता समाप्त कर दी है। समाज नामक पिंजरे से अब उसको आजादी मिली लेकिन अब उसकी निर्भरता सिर्फ और सिर्फ पैसे पर हो गई। पहले यह था (बुजुर्ग अभी तक कहते हैं) कि “समाज है तो सबकुछ है, वरना कुछ नहीं है”। अब रिप्लेस हो गया कि “पैसा है तो सबकुछ है, वरना कुछ नहीं है”। समाज की जगह पैसे ने ले ली। सुख सुविधाएं, मान-सम्मान, इज्जत, शोहरत सब कुछ पैसे का मोहताज हो गया।
तो जब सब कुछ निर्भर ही पैसे पर हो गया तो स्वभाविक ही था कि पैसे कमाने के लिए इंसान की लालसा बढ गई। पैसों के लिए दौड़ (कम्पीटीशन) ऐसी शुरु हुई कि सब पीछे छूट गया। फुर्सत, सेहत, घर, परिवार, रिश्ते सब पैसे के हत्थे चढ गये। पैसा खुदा हो गया। आज कोई एक इंसान चाहकर भी इस दुनियावी हकीकत को बदल नहीं सकता, लड़ नहीं सकता। सीन यह है कि कोई व्यक्ति पैसे के खुदा होने को नकारता भी है तो आज दुनिया उसे नकारने नहीं देती, पग पग पर उसे यह अहसास करवाती है कि वो गलत है, पैसे के पीछे तो उसे भागना ही है। हम सब इसी दौड़ के लिए तो पैदा हुए हैं कि चलो पैसे कमाएं।
किसी भी दौड़ का मनोविज्ञान यह है कि एक बार हम दौड़ना शुरु करने के बाद यह नहीं सोचते कि हम दौड़ क्यों रहे हैं? फिर सब कुछ भूल कर सिर्फ दौड़ में जीतना ही मकसद रह जाता है। तो बस अब हम सब बिना सोचे दौड़े जा रहे हैं फुल स्पीड से यह अनंत दौड़, एक दूसरे से आगे निकलने की कोशिश में।