CJP GenZ Protest
1. लोगों का दावा है कि GenZ बहुत समझदार है, ये है वो है फलाणा ढिकाणा…
ऐसा कुछ नहीं है भाई। GenZ में सैंकड़ों अच्छी बातें हैं लेकिन ‘पॉलिटिकल अवेयरनेस’ उनमें से एक नहीं है। 15 जुलाई तक अधिकतर को पता भी नहीं था कि कोई पेपर लीक हुआ है, प्रोटेस्ट चल रहा है और धर्मेन्द्र प्रधान नाम का कोई आदमी भी है जो शिक्षा मंत्री है। GenZ सिर्फ FOMO में देश बचाने पहुंचा था। सोनम वांगचुक के भूख हड़ताल के वीडियोज वायरल होने के बाद जो इमोशनल अपील क्रिएट हुई उसने तीन-चार दिन में FOMO का रूप ले लिया। आप FOMO क्रिएट कर दीजिए, ये शी जिनपिंग को भारत का प्रधानमंत्री बनाने भी पहुंच जाएंगे, भले ही आज तक जिनपिंग का कभी नाम भी ना सुना हो। और यह बात सिर्फ GenZ की नहीं है, सभी जनरेशन के अधिकतर लोगों के साथ ऐसा है।
2. बहुत लोगों को शिकायत है कि नेशनल मीडिया पहले नहीं पहुंचा।
नहीं पहुंचना वाजिब है। जंतर-मंतर पर हर रोज 500-1000 लोग बैठे ही रहते हैं किसी ना किसी मांग को लेकर, कुछ दिनों पहले करणी सेना वाले भी बैठे थे। सब को नेशनल मीडिया फ्रंट पेज नहीं दे सकता। असल में यह आंदोलन शुरु ही तब हुआ, जब सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल को 15-16 दिन हो गए। उससे पहले this was just a joke. डेढ सौ करोड़ की आबादी वाले देश में 200-300 लोगों का धरना नेशनल न्यूज नहीं होना चाहिए।
2. भाजपा को नुकसान हुआ है, पर कांग्रेस को फायदा नहीं हुआ है। बस भाजपा को ज्यादा नुकसान हुआ है, कांग्रेस को कम।
3. यह होना बेहद जरूरी था, इस सरकार का एरोगैंस तोड़ने के लिए। पिछले कुछ सालों से जिस तरह ये लोग देश चला रहे हैं, अब इनका निपटना जरूरी है। भले ही इनके बदले जो आएंगे वो इनसे भी घटिया हैं, लेकिन एक बार इनका घमंड टूटना जरूरी है।
4. हालांकि इस सबसे घंटा कुछ हासिल होने वाला नहीं है। हर आंदोलन की तरह इस आंदोलन का हासिल भी शून्य है। पेपर लीक हमेशा होते रहे हैं और होते रहेंगे। 15 दिन का तमाशा था, हो गया (फिलहाल IPL भी नहीं है, लेकिन कुछ ना कुछ नये मनोरंजन का इंतजाम जल्दी ही हो जाएगा) आप अपने बच्चों को इससे बचाना चाहते हैं तो इस फालतू की भसड़ को छोड़कर सिर्फ पैसे कमाने पर ध्यान दीजिए। आपके पास दो ही रास्ते हैं: या तो इस काबिल बनिए कि जब पेपर लीक हो तो अपने बच्चे को पेपर खरीद कर दे सकें… या फिर आपके बच्चे को सरकारी पेपर देना ही ना पड़े।
बाकी अटल जी के शब्दों में कहें तो, सरकारें आएंगी जाएंगी लेकिन पेपर यूं ही लीक..
5. आंदोलनों की सबसे बड़ी समस्या है कि हर आंदोलन एक “मसीहा” पैदा करता है। इस आंदोलन की सबसे अच्छी बात है कि इस आंदोलन से कोई मसीहा पैदा नहीं हुआ। दिप्के वगैरह की क्रेडिबिलिटी अभी भी जीरो के आसपास ही है। हालांकि पॉलिटिकल सर्किल में इनकी अच्छी खासी पैठ हो जाएगी। कुल मिलाकर देश को नया योगेन्द्र यादव Lite मिल गया है। योगेन्द्र यादव से याद आया, एक क्रांतिकारी युवा छात्र नेता कन्हैया कुमार भी तो था, आजकल कहां है? छात्रों के आंदोलन में दिखा नहीं?
6. अभी जोश-जोश में ये लोग 2-5 आंदोलन और करेंगे अगले कुछ महीनों में। फिर धीरे धीरे पब्लिक बोर हो जाएगी और इनका हश्र भी करणी सेना के आंदोलनों की तरह होगा। अमरुदों के बाग में 2 लाख लोगों के आने का दावा करके टेंट लगाएंगे, लेकिन सिर्फ़ आठ सौ लोग आएंगे।
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