इतिहास
मैं सम्पूर्ण विश्व के लिखित इतिहास को खारिज करता हुं। दरअसल इतिहास झूठ का पुलिंदा मात्र है और कुछ नहीं। फिर चाहे वो वामपंथियों का इतिहास हो, इस्लामिक इतिहास हो अथवा संघियों का। सबका अपना अपना ‘स्व-प्रमाणित’ इतिहास है परन्तु पूर्ण सत्य कुछ भी नहीं है।
क्योंकि जिन्होंने भी इतिहास लिखा है अथवा पुस्तकें लिखीं हैं, वो अवश्य ही किसी न किसी धर्म के होंगे, किसी न किसी विचारधारा के होंगे। तो क्या ये संभव है कि कोई भी इतिहासकार अपने धर्म अथवा विचारधारा तथा पूर्वाग्रहों से स्वतंत्र होकर लिख सके?
चलिए मान लीजिए कि कोई व्यक्ति धर्म-निरपेक्ष तथा वैचारिक निरपेक्ष होकर लिख भी दे, लेकिन वो लेखक किसी न किसी राज्य का निवासी होगा, और उस राज्य का कोई न कोई राजा भी होगा। तो क्या यह संभव है कि कोई व्यक्ति किसी राजा के दरबार में रहकर उस राजा के खिलाफ स्वतंत्रतापूर्वक लिख पाए? वो भी उस कालखण्ड में जब राजा सर्वोपरि होता था और किसी को मृत्यदंड देने पर उससे जवाब मांगने के लिए मीडिया नहीं हुआ करता था।
बस यही कारण है कि ना तो मैं चंद्रवरदायी के ‘पृथ्वीराज रासो’ को प्रमाणिक मानता हुं और ना ही हमीद इब्ने मुस्लिम द्वारा लिखी गई कर्बला की कहानी को। ना ही इनकी सत्यता पर बहस करता हुं किसी से। क्योंकि उस बहस का कोई औचित्य है नहीं। अब ना तो टीपू सुल्तान के समय में मैं मौजूद था और मैं गारंटी के साथ कह सकता हुं कि ना ही मुझसे बहस करने वाला होगा। तो कैसे साबित होगा कि कौन सही है और कौन गलत? टीपू सुल्तान हीरो था या विलेन?? और जब किसी बहस से साबित कुछ होना है नहीं, निष्कर्ष कुछ निकलना है नहीं, उस बहस में समय और ऊर्जा व्यर्थ करने का क्या फायदा?
इसलिए बेहतर है कि आरक्षण, जातिवाद दिनोंदिन बढने के कारण, लोकतंत्र की विफलता, राजनीति के चारित्रिक पतन जैसे अनेक आवश्यक मुद्दों पर चर्चा या बहस हो। वर्तमान पर बहस हो, भविष्य पर चर्चा हो लेकिन इतिहास पर राजनीति ना हो।
GhanShyam Singh Odint
