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1. इस बार भाजपा के वोटर्स में भी सरकार से असंतोष और नाराजगी है। उनमें से अधिकतर “मोदी ने किया है तो कुछ सोच समझ कर ही किया होगा” से कई किलोमीटर दूर आ चुके हैं। आखिरकार चश्मा उतर रहा है। कई भाजपा के वोटर खुलेआम अपने स्टेटस/स्टोरी पर विरोध भी कर रहे हैं और कुछेक जंतर-मंतर भी जा रहे हैं। हालांकि इनमें से अधिकतर पेपर लीक के खिलाफ हैं, भाजपा के खिलाफ नहीं।

कांग्रेस और कांग्रेसियों को इस सब भसड़ से कोई मतलब नहीं है। वो अलग आध्यात्मिक लेवल पर हैं। फीफा देख रहे हैं, क्रिकेट का लुत्फ उठा रहे हैं, प्रियंका गांधी की नाक इंदिरा से मिला रहे हैं, पायलट-गहलोत में से कौन 2028 में राजस्थान का CM बनेगा वगैरह वगैरह में व्यस्त हैं।

2. मोदीजी के भक्तगण भी अब मोदीजी के कंन्टीन्यूअस मास्टर स्ट्रोकों से तंग आ चुके हैं। उनका हो गया है। कोई मोदी की आलोचना करे तो वो अब बेमन से सिर्फ हल्की-फुल्की बहस करते हैं, मां-बहन की गाली देकर उस “देशद्रोही” की कॉलर नहीं पकड़ते। मतलब मोटा-मोटी “भक्त” प्रजाति अब लुप्त होने के कगार पर है। देखना इस पोस्ट के कमेंट्स में भी नजर नहीं आएंगे, जबकि पहले ऐसी सरकार विरोधी पोस्ट पर कमेंट बॉक्स में आतंक मचा देते थे।

3. एक बड़ा वर्ग और है.. जो कभी भक्त नहीं थे लेकिन भाजपा को वोट जरूर देते थे। ऐसे काफी सारे लोग पेपर लीक पर सरकार के खिलाफ हैं, विरोध करना चाहते हैं, दिल्ली जाकर प्रदर्शन में भी शामिल होना चाहते हैं। मोदी के खिलाफ गुस्सा हैं लेकिन उन चू#यों को सपोर्ट नहीं करना चाहते। उन्हें पता है कि इन लोगों को ना तो पेपर लीक से मतलब है, ना मरने वाले बच्चों से और ना देश से। ना इसके पास कोई विजन है कि धर्मेन्द्र प्रधान ने इस्तीफा दे भी दिया तो उसके बाद क्या?

इसलिए ये बड़ा वर्ग चुपचाप, निराश अपने घर बैठा है।

और सबसे दुर्भाग्य की बात यह है कि इस वैक्यूम को भरने की कहीं कोई छोटी सी भी उम्मीद/प्रयास नजर नहीं आता। और महाअफसोसजनक बात यह है कि इस बड़े वर्ग को 2029 में फिर से मजबूरी में मोदी/भाजपा को वोट देना पड़ेगा।

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