महाराणा प्रताप और हल्दीघाटी

पैमाने बदलो अपने। महानता के मापदंड भी। क्यों तुम्हें जीत से इतना मोह है कि हार स्वीकार ही नहीं? महाराणा प्रताप की महानता ना तो हार या जीत की मोहताज है और ना ही तुम्हारे सरकारी सर्टिफिकेशन की।

अगर जीत ही तुम्हारे लिए महानता का पैमाना है तो चंगेज खां और तैमूर को महान मानने में क्या समस्या है? महाराणा प्रताप की हार या जीत उनकी महानता तय नहीं करती। प्रताप का चुनाव उन्हें महान बनाता है। गुलामी या आजादी में से आजादी का चुनाव, समर्पण या संघर्ष में से संघर्ष का चुनाव, दासता के सुख-वैभव और स्वाभिमान की घास की रोटी में से घास की रोटी का चुनाव, गौरवरहित जीवन या गौरवमयी मौत में से मौत का चुनाव, आसान और कठिन में से कठिन का चुनाव उन्हें महान बनाते हैं। आखिर तक संघर्ष करने की हिम्मत उन्हें महान बनाती है। पराजय निश्चित होने के बावजूद लङने का हौसला महाराणा प्रताप और पौरुष (पुरु) को आदर्श बनाता है, जीत भले ही किसी अकबर की हुई हो या सिकंदर की। मानसिंह जैसे गुलाम विजेताओं की बजाय मेरे आदर्श सदैव स्वतंत्र महाराणा प्रताप रहेंगे, हल्दीघाटी में वो हारे थे या जीते थे कोई मायने नहीं रखता।

अगर हार से महाराणा की महानता कम होती तो इन 500 सालों में हो चुकी होती, तुम जिताने वाले तो 500 साल बाद पैदा हुए हो और मात्र जीतने से ही कोई महान होता तो अल्लाऊद्दीन खिलजी भी अब तक महान हो चुका होता, रोकने वाले तो तुम अब 700 साल बाद पैदा हुए हो। बाकी…

लश्कर भी तुम्हारा है, सरदार तुम्हारा है

तुम झूठ को सच लिख दो, अखबार तुम्हारा है

हम इसकी शिकायत करते तो कहां करते

सरकार तुम्हारी है, दरबार तुम्हारा है..

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