भारतीय शिक्षा प्रणाली
जहां तक भारतीय शिक्षा प्रणाली की बात है, इसमें ना तो शिक्षा है और ना ही कोई प्रणाली। सिर्फ डिग्रियां हैं, जो कि हर कोई चौमूं लिए घूमता है। एक मेरे पास भी है ग्रेजुएशन की (जो कि मैंने गिरते पड़ते सात साल में हासिल करी थी), जिससे मेरी बीवी लाईट चली जाने पर हवा करती है। इससे डिग्रियों के महत्व का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। लोग पढ लिखकर परेशान हैं कि उन्हें उनकी डिग्री के लायक रोजगार/सैलेरी नहीं मिल रही। एम्प्लॉयर परेशान हैं कि उन्हें डिग्रीधारी तो मिल जाते हैं लेकिन काम करने लायक काबिल बंदे नहीं मिल रहे जॉब देने के लिए। MA, B.Ed किए हुए लोग बैंक में दूसरों से विड्रॉल फॉर्म भरवाते नजर आते हैं। BCA किए हुए लोग सन् 2021 में भी आधा किलोमीटर दूर रिचार्ज की दुकान पर जाकर फोन में टॉपअप करवाते देखे जाते हैं। कूलडूड-डूडणी वाली प्रजाति अरविंद केजरीवाल को भारत का राष्ट्रपति बताती है।
खैर, यह लिस्ट अनंत है। और बाकी जो शिक्षा प्रणाली की ऐसी तैसी हो रखी है उससे लगभग सभी अवगत और सहमत हैं ही। ऊपरा ऊपरी बदहाली के कारण आप जानते ही हैं कि सरकारें बकलोल हैं, टीचर आधे के लगभग आरक्षण की देन हैं, जो काबिल भी हैं उनके माहौल विपरीत है वगैरह वगैरह। इसलिए इन सार्वजनिक कारणों को छोड़ कर सीधा डीप में चलते हैं।
हमारी बहुत बड़ी समस्या यह है कि हम सक्सेस ऑरिएंटेड समाज हैं। असफलताएं हजम नहीं होती हम से। कोई जगह नहीं है हमारी लाईफ में, हमारे समाज में असफलता के लिए। हम सक्सेस को पूजने वाले लोग हैं। हमें फर्क नहीं पड़ता कि वो सक्सेस कैसे आई है, बस सक्सेस आनी चाहिए। और सक्सेस भी क्या है हमारे लिए? पैसा। सक्सेस मतलब पैसा, पैसा मतलब आदमी सक्सेसफुल। सक्सेसफुल मतलब आदमी समझदार, लायक, टैलेंटेड। उसकी इज्जत, उसके सामने सब नतमस्तक। कि देखो फलाणा आदमी कितना होशियार है, सौ फीट का प्लॉट खरीदा था, आसपास का दाब दबा कर आज सवा सौ फीट कर लिया। गौर कीजिए, वो आदमी हमारे लिए “होशियार” है, कमीना नहीं है। भले ही हम कितने भी शराफत पसंद, ईमानदारी पसंद, सत्य पसंद होने का ढोंग करते हों, लेकिन हर चोर, अपराधी, स्मगलर, झूठा, चापलूस यदि पैसे कमाता है तो वो सेलेब्रेटेड है हमारे समाज में।
यही देखते हुए बच्चा बड़ा होता है हमारे यहां। वो किसी शादी में देखता है कि एक थोड़ा बहुत ज्ञानी आदमी है जो टेंट के एक कोने में बेचारा अकेला बैठा होता है। एक दूसरा आदमी जो बिल्कुल चौमूं है लेकिन उसके पास थोड़ा पैसा और गाड़ी है, वो महफिल की शान होता है। वो टेंट के बीच वाली टेबल पर बैठकर पूरे कॉन्फिडेंस के साथ दुनिया के हर टॉपिक पर अलट सलट वाट्सएपिया ज्ञान बांटता है लेकिन सब लोग उसके सामने नतमस्तक होकर उसकी हां में हां मिलाते हैं, उसके आगे पीछे लहालोट हुए जाते हैं।
बताईए वो बच्चा किस जैसा बनना चाहेगा? वो बड़ा हो कर ज्ञान कमाना चाहेगा या पैसा? कॉमन सेंस की बात है, पैसा।
बस कृपा यहीं अटकी हुई है। हमारी गलती नहीं है, हम सब इसी माहौल में बड़े हुए हैं जहां सिर्फ सफलता सेलेब्रेटेड है। हम ने हमेशा से एक ही उद्देश्य समझा है जीवन का.. सफल होना है, पैसा कमाना है। पैसा नहीं होगा तो सक्सेसफुल नहीं कहलाएंगे। सक्सेसफुल नहीं होंगे तो समझदार नहीं कहलाएंगे, इज्जत नहीं मिलेगी, नाम नहीं मिलेगा। और फिर हम सफल होने को अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य बना लेते हैं। सफल होने का प्रेशर इतना हावी हो जाता है हम पर, कि इसके आगे हम को कुछ एक्सप्लोर करना सूझता ही नहीं है। असफल होने का तो रिश्क भी नहीं ले सकते, बस सफल तो होना ही है, किसी भी कीमत पर। चाहे उसके लिए अपनों से दूर परदेश जाना पड़े, अपनों को धोखा देना पड़े, खुद को धोखा देना पड़े, झूठ बोलना पड़े, चमचागिरी करने पड़े, सुख चैन खोना पड़े, बीपी की गोलियां खानी पड़े लेकिन सफल तो मैं हो कर रहुंगा.. हमरि जिनगी का इको ही मकसत है.. सफलता। यही हमें सिखाया जाता है कि रुको मत, दौड़ते रहो लक्ष्य प्राप्ति तक वगैरह वगैरह.. तमाम टाईप के हमारे कथित महापुरुषों के quotes इसी सफलता के लिए हमें मोटीवेट करते हैं। इसके अलावा आजकल तो मार्केट में मोटीवेशन गुरु भी आ गये हैं जो मोटीवेशनल सेमीनार्स में आपके 24 घंटे के एक एक सैकंड का हिसाब किताब तय करके आपको बता देते हैं कि अगले तीस सालों तक बस इस तरह जीते रहोगे तो आखिर 60 की उम्र में तुम सक्सेसफुल हो जाओगे। क्या करना है भाई 60 की उम्र में सक्सेसफुल हो कर? नहीं होना भई इस तरह मशीन बनकर सक्सेसफुल। उससे बढिया है 60 साल तक शांति से जी कर असफल मर जाओ।
अच्छा एक चीज पर और गौर कीजिए, लगभग हमारे लिए महापुरुष ही वही हैं जो सक्सेसफुल थे। जैसे ही हमें कोई कहता है कि महाराणा प्रताप हल्दीघाटी में हार गये थे, हम बिलबिला उठते हैं। हार कैसे गये थे? हार कैसे सकते हैं महाराणा प्रताप? हम तो प्रताप को हल्दीघाटी जीताकर ही मानेंगे। हार गये तो फिर वो महापुरुष ही नहीं रहेंगे हमारे लिए, हम उन्हें हारने नहीं देंगे चाहे कुछ भी हो जाए।
खैर वापस मुद्दे पर आते हैं, हम दरअसल सफल होने के लिए पढते हैं, ज्ञान पाने के लिए नहीं। IIT किए हुए बंदे की समाज में वैल्यू इसलिए नहीं है कि उसके पास नॉलेज है बल्कि इसलिए है कि उसके पास पैकेज है। इसीलिए कोई भी बंदा आविष्कार करने के लिए आईआईटी नहीं करता, यूएस में नौकरी के लिए आईआईटी करता है। मुझे नहीं लगता कि हम में से कोई भी यह दावा कर सकता है कि वो सफल होने के लिए नहीं पढा बल्कि ज्ञान पाने के लिए, अच्छा इंसान बनने के लिए पढा है। हमारे घर वाले भी हमें ज्ञान लेने या अच्छा इंसान बनने के लिए स्कूल नहीं भेजते, बल्कि इसलिए भेजते हैं कि हम नौकरी पा सकें।
तो जब आप स्कूल जा ज्ञान लेने के लिए नहीं रहे, आपके घरवाले आपको भेज ज्ञान के लिए नहीं रहे तो टीचर को क्या पागल को कुत्ते ने काटा है जो वो आपको ज्ञानी बनाने की कोशिश करेगा? वो आपको नौकरी लगाने के हिसाब से ही तो पढाएगा, यही तो आप और घरवाले उससे चाहते हैं। आपको मार्क्स चाहिए होते हैं वो आपको दिलवाता है तमाम तिकड़मों से। शॉर्टकट्स बताकर, वनवीक सीरीज देकर, नकल करवाकर, इंटरनल में 20 में से 20 भेजकर वगैरा वगैरा। कोचिंग्स खुली हुई हैं, जो Tricks सीखाती हैं एग्जाम्स के लिए। आपको इंग्लिश नहीं आती कोई बात नहीं, हमारे इंस्टीट्यूट में आईए.. हम आपको इंग्लिश नहीं सिखाएंगे, वो तो आप सीखना भी नहीं चाहते, हम आपको ट्रिक्स देंगे जिनसे आप एग्जाम निकाल सकते हो। एग्जाम ही तो निकालना है, सीखनी किसे है? बस एक एग्जाम निकल जाए, सक्सेस मिल जाए, लाईफ सेट है, फिर क्या करना है इंग्लिश से? सक्सेस होने के बाद तो गलत भी बोलेंगे तो कौन हिम्मत करेगा हमें गलत कहने की? हम जैसी बोलेंगे वही इंग्लिश होगी।
हालत यह है कि मैं अंदाजे नहीं बल्कि दावे से कह सकता हुं कि 90% से अधिक भारतीयों ने अपने कॉर्स के अलावा जिंदगी में कभी कोई किताब नहीं पढी होगी। जो किताबें हमें नौकरी के करीब ले जाएं उन्हें छोड़कर कब हम पढने बैठे हैं आजतक? तो कैंचो ज्ञान आएगा कहां से? दोष हम सारा सरकार और सिस्टम पर डाल देते हैं। दोष उनका भी पूरा पूरा है, लेकिन सिर्फ और सिर्फ उनका नहीं है। दोष हमारा उनसे भी ज्यादा है।
पैसा जीवन की आवश्यकता है, उसे आवश्यकता ही रहने दीजिए, पैसे को अपना शौक बनाकर जिंदगी मत बर्बाद कीजिए। अपने आसपास देखिए उन लोगों को जिन्हें आपने हमेशा पैसों के लिए दिन रात भागते देखा है, कभी आपने उन्हें मुस्कुराते/हंसते देखा है आजतक? कभी देखा है आपने उनके चेहरे पर सुकून? क्या किसी को मरते टाईम पैसे साथ लेकर जाते देखा है? नहीं ना। तो क्यों हो जाना चाहते हैं आप उनके जैसा? मस्त रहिए, वो करिए जो आपको करना पसंद है। असफल होईए ना बिंदास हो कर, क्या बिगड़ जाएगा? पैसों के पीछे भागकर सफल होने से बेहतर है कि मस्त रहकर असफल ही हो लिया जाए। पैसे उतने ही कमा लीजिए जितने आप अपनी मस्ती से जिंदगी जीते हुए कमा पाएं, जितने खर्च कर पाएं, जितने से जरूरतें पूरी कर पाएं, ख्वाहिशों का तो कोई अंत नहीं। वैसे भी आप कितने भी इकट्ठे कर लें, आपकी आगामी पीढियों को तो फिर भी कमाने ही पड़ेंगे। देखिए ना धीरुभाई कितना कमाकर गये थे, फिर भी मुकेश को कमाना तो पड़ ही रहा है ना, अनिल का तो दिवालिया निकल गया। तो क्या फायदा इकट्ठा करने में खपने का?
कोई आदमी असफल हो जाए तो उसे चौमूं मत समझिए और कोई चार पैसे कमा ले तो उसे खुदा मत समझिए, शिक्षा प्रणाली अपने आप ठीक हो जाएगी। शिक्षा प्रणाली ही क्या बहुत कुछ ठीक हो जाएगा।