सफलता और नैतिक पतन

इस देश की जनता का जो नैतिक पतन आप देख रहे हैं, कभी सोचिए कि इसकी जड़ कहां है? देखते ही देखते हम आपदा के समय “लोगों की सेवा करने के दौर” से आपदा में अवसर ढूंढकर “एक हजार की चीज 40 हजार में बेचने के दौर” में पहुंच चुके हैं, वो भी दवाई की जगह पानी भरकर।

यह जो हमारा नैतिक पतन हुआ, इतनी स्पीड से दुनिया में शायद ही किसी समाज का हुआ हो। इसकी जड़ है “किसी भी कीमत पर सफलता चाहिए” का सिंड्रोम। पता नहीं कहां से पिछले कुछ दशकों में यह सिंड्रोम हमारे जनमानस में स्थापित हो गया। हर आदमी को सफल होना है “किसी भी कीमत पर”।

दरअसल ‘सफलता’ का अस्तित्व ही इस बात पर है कि वो लिमिटेड लोगों को ही हासिल हो सकती है, अगर हर किसी को हासिल हो जाए फिर वो सफलता नहीं रहती कॉमन चीज हो जाती है। इसलिए सफलता का मार्केट में Limited Stock available है, लेकिन सफलता चाहिए हर किसी को। इस वजह से डिमांड एंड सप्लाई के रूल के हिसाब से सफलता महंगी हो गई है रैमडिसिवर की तरह। हर कोई सफलता के लिए एक दूसरे से अधिक कीमत चुकाने को तैयार है। कोई भ्रष्टाचार करने को तैयार है, कोई चोरी करने को तैयार है, कोई जमीर बेचकर चमचागिरी करने को तैयार है तो कोई रैमडिसिवर के इंजेक्शन में पानी भरकर उसे चालीस हजार में बेचकर पेशेंट का मर्डर करने के लिए तैयार है। और लोग यह सब एक दूसरे से ऊंची कीमत बिना किसी ग्लानि के चुकाने को तैयार हैं। क्योकि उन्हें यह समझाया गया है कि “सफलता की कीमत तो चुकानी ही पड़ती है”। जो जितनी बड़ी कीमत चुकाने की पोजिशन में है वो उतनी बड़ी कीमत चुकाने को तैयार है। कोई दवाईयों की कालाबाजारी की पोजिशन में है, तो कोई ऑक्सीजन सिलेंडर्स की, तो कोई मानव अंगों की। जो जिस पोजिशन में है, जितना कर पा रहा है वो बिना शर्म के कर रहा है। उन्हें बिल्कुल भी गिल्ट फील नहीं हो रहा कि उनकी सफलता की कीमत लोगों की जान से चुकाई जा रही है। लोग मरें तो मरें, हमें तो सफल होना है किसी भी कीमत पर।

यहां के माहौल में यह सिंड्रोम गहरा घुस गया है, कोरोना का पता नहीं लेकिन यह सिंड्रोम आपके चारों तरफ हवा में फैल चुका है। हजारों कोट्स, महापुरुष, मोटिवेशनल गुरु, यूट्यूबर, फेसबुकिये आपको ज्ञान देने के लिए घेरे हुए हैं कि सफल कैसे होना है। विवेक बिंद्राओं, संदीप माहेश्वरियों ने ऐसा माहौल बना दिया है कि जैसे आप सफल होने के लिए ही पैदा हुए हों, यही आपकी जिंदगी का एकमात्र उद्देश्य हो। बीपी हो जाए, डिप्रेशन हो जाए, 24 में से 20 घंटे काम करना पड़े, सोशल लाईफ फैमिली लाईफ झंड हो जाए लेकिन बेटा सफल तो हो कर रहना है।

सफलता यहां इतनी सेलेब्रेटेड हो चुकी है कि कोई अपने सौ गज के प्लॉट को आसपास की जमीन दाब कर 110 गज का कर ले तो हम उसे होशियार कहते हैं, गौर कीजिए होशियार कहते हैं, कमीना या हरामी नहीं। अपने आसपास देखिए कि आपके घर परिवार रिश्तेदारी में कितने ऐसे “होशियार” लोग भरे पड़े हैं जिनकी तरह “होशियार” ना होने की वजह से आपको ताना सुनना पड़ता होगा कि उसे देख कुछ सीख तू भी।

तो बाबू जब आपका भाई भतीजा आसपास की जमीन दाबकर या ऊपर की कमाई करके होशियार है तो फिर सबकी अपनी अपनी होशियारी है, कोई आपको चालीस हजार में पानी का इंजेक्शन बेचकर होशियारी दिखा रहा है, कोई आपको 60 किमी हॉस्पिटल पहुंचाने के 50 हजार लेने की होशियारी दिखा रहा है, वो फिर कमीने क्यों हैं? वो भी होशियार हैं अपने घर वालों के हिसाब से। परिभाषाएं बदलना चाहते हैं तो सबके लिए बदलनी होंगी। तुम्हारा कुत्ता - कुत्ता और हमारा कुत्ता - टॉमी, वाला फॉर्मूला नहीं चलेगा।

“सफलता किसी भी कीमत पर” की बजाय सफलता की कीमत तय करनी होगी, कि मुझे सफलता चाहिए तो मेरी कीमत पर चाहिए। मुझे किसी को मारे बिना, अपना जमीर बेचे बिना सफलता चाहिए। मिलती है तो ठीक, वरना ना सही, अपन बिना सफलता के ही ठीक हैं। महीने में सिर्फ दस दिन काम करके सफलता चाहिए, सुबह 8 बजे उठकर सफलता चाहिए, इस कीमत पर मिलती है तो ठीक है वरना सफलता अपनी ऐसी तैसी करवाए। सुबह 4 बजे उठने से सफलता मिलती हो ऐसी सफलता अपने को चाहिए ही नहीं।

सब लोग अपनी अपनी सफलता की अधिकतम कीमत तय कर लेंगे तो यह सब झंझट ही खत्म हो जाएगा। सोचिए कि जो आदमी सफलता के लिए सुबह चार बजे उठ नहीं सकता वो आदमी ना तो सफलता के लिए चोरी कर पाएगा, ना वो किसी का मर्डर कर पाएगा। सफलता का बेशकीमती हो जाना ही इस नैतिक पतन का कारण है।

#सफलता

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