तालिबान, अफ़ग़ानिस्तान और अमेरिका

तालिबान पूरे अफगानिस्तान पर 15-20 दिन में कब्जा कर लेगा। उसके बाद क्या होगा वो समझिए।

संपूर्ण सिस्टम पर कब्जा करके साल दो साल बाद तालिबान अफगानिस्तान में लोग-दिखाऊ चुनाव कराएगा, जिसमें जाहिर सी बात है तालिबान एकतरफा जीतेगा और अभी जो उनका ‘कमांडर या सरगना’ कहला रहा है वो ‘राष्ट्रपति’ कहलाने लगेगा और लड़ाके सूटबूट पहन कर अलग अलग विभागों के “मंत्री” कहलाएंगे। इन चुनावों पर स्विट्जरलैंड में बैठा अफगानी राष्ट्रपति असरफ गनी UN में रंडी रोना करेगा, अमेरिका एकाध बयान जारी करेगा, भारत कड़ी निंदा करेगा और चीन इस तालिबान सरकार को मान्यता प्रदान करेगा, और उसके बाद पाकिस्तान और अन्य चीन स्पॉन्सर्ड देश इस तालिबान सरकार को मान्यता देंगे। 10-15 साल में दुनिया के आधे देश तालिबान की सरकार को मान्यता दे चुके होंगे। इसी बीच असरफ गनी कहीं मर मरा जाएगा तो “आधिकारिक और लोकतांत्रिक सरकार” वाला रंडी रोना भी खत्म हो जाएगा और तालिबानी सरकार ही अफगानिस्तान की आधिकारिक सरकार हो जाएगी। 30-35 साल बाद भारत के साथ साथ अफगानिस्तान भी संयुक्त राष्ट्र संघ की ‘सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता’ की मांग कर रहा होगा। एकाध को छोड़कर लगभग सारे देश तालिबान सरकार को मान्यता दे चुके होंगे और उनके साथ व्यापार कर रहे होंगे। अमेरिका और इजराइल तालिबान को लेटेस्ट टेक्नोलॉजी की मिसाइलें बेच रहे होंगे। अरब देश तालिबान को (अगर सौर ऊर्जा ने टेक ऑवर ना कर लिया तो) तेल बेच रहे होंगे। चीन तो सबकुछ ही खरीद बेच रहा होगा।

फिर एक दिन अमेरिका/इंग्लैंड/भारत के तत्कालीन मोदीजी अफगानिस्तान दौरे पर जाएंगे और अभी जो तालिबान का हेड है अब्दुल बारादर (जो कि तब तक बूढा होकर मर चुका होगा और अफगानिस्तान का राष्ट्रपिता घोषित हो चुका होगा) उसके मेमोरियल पर फूल चढाएंगे और भाषण में बताएंगे कि किस प्रकार अब्दुल बारादर जी और मुल्ला उमर जी ने अपना सर्वस्व न्यौछावर करके अफगानिस्तान को असरफ गनी की तानाशाही सरकार से आजादी दिलाई थी। किस प्रकार आज के युवाओं को उनसे आदर्श जीवन की सीख लेनी चाहिए। और कैसे खुद मोदीजी बचपन से ही तालिबानी बनना चाहते थे।

और आप जो सोशल मीडिया पर अफगानिस्तान का लोड लेकर पोस्टें चेंप रहे हैं, 30-40 साल बाद आपके खुद के बच्चे अब्दुल बारादर की “सिगार फूंकते हुए” फोटवें अपनी टीशर्ट्स पर छपवाए उन्हें क्रांति का प्रतीक बताते घूमेंगे। कोई तत्कालीन रवीश कुमार अब्दुल बारादर जी के जीवन चरित्र पर प्राइम टाईम कर रहा होगा, कोई एजाज खान अजमेर में लगी बारादर जी की प्रतिमा को किसी असामाजिक तत्व द्वारा खंडित कर दिए जाने पर इंस्टाग्राम लाईव करके हिंदुस्तान के टुकड़े टुकड़े कर देने का रंडीरोना मचा रहा होगा, कोई औवेसी लखनऊ में किसी ‘बारादर रोड’ का फीता काट कर उद्घाटन कर रहा होगा, कोई फिल्मस्टार अपने बेटे का नाम अब्दुल बारादर या मुल्ला उमर रख रहा होगा, कन्हैया कुमार बुढापे में बारादर जी के सामाजिक न्याय के सपने को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहा होगा। खुद आपके ही बच्चे यहां पोस्टें पेलेंगे कि किस प्रकार आदरणीय अब्दुल बारादर जी ने अफगानिस्तान को शोषण और अत्याचार से मुक्ति दिलाकर जनहितकारी शासन की स्थापना की थी। वो आपकी पोस्टें पढकर आप पर शर्मिंदा हो रहे होंगे कि मेरे पिता इस सर्वहारा क्रांति के समय बुर्जुआ पूंजीपति सरकार के पक्ष में पोस्टें चेप रहे थे। आप उससे बहस करेंगे तो वो अपनी स्कूल सेलेबस की किताब लाकर आपको बारादर जी का जीवन वृतांत पढाएगा, और मुल्ला उमर की वीरता के किस्से सुनाएगा।

इसलिए अपनी सारी उछलकूद व्यर्थ है। जो हो रहा है वो सामान्य घटना है। क्रांतियां ऐसे ही होती हैं। अभी शायद यह सब पढने में आपको अटपटा लगा होगा लेकिन पहले भी दुनिया में ऐसा ही होता आया है। चाईना (1949), रूस (1917-1923), क्यूबा (1953-1959), उत्तर कोरिया (1949) में स्थापित वर्तमान सरकारें अपने टाईम की तालिबान ही थी, उन्होंने भी सेम इसी तरह ‘लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई’ सरकारों को हिंसक तरीकों से अपदस्थ करके सत्ता कब्जाई थी। और माओ त्से तुंग, किम जोंग, लेनिन, कास्त्रो, चे ग्वेरा आपके हिसाब से क्या हैं? क्रांतिकारी?? तो फिर बारादर जी में क्या दिक्कत है??? वैसे भी भारत का बुद्धिजीवी वर्ग तो इनकी क्रांति को मौन मान्यता दे ही चुका है।

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