दोस्ती और राजनीति
देश बंट रहा है/बंट चुका है। इसमें कोई शक नहीं है। एक रेखा खिंच गई है, आधे लोग इस तरफ खङे हैं बाकी आधे उस तरफ खङे हैं। कई दोस्त, कई रिश्तेदार, कई सहकर्मी आधे आधे बंट कर इस रेखा के आरपार खङे हो गये हैं, ऐसा लग रहा है जैसे कि एक महाभारत पुनः घटित होने के इंतजार में खङा हो।
अभी एक इंटरव्यू में तिग्मांशु धुलिया को कहते सुना कि “शेखर कपूर (जिनकी अंगुली पकङ कर तिग्मांशु सर फिल्ममेकिंग सीखे थे) बहुत अच्छे इंसान है लेकिन वो अभी BJP को सपोर्ट करने लगे हैं इसलिए उनसे आजकल बातचीत नहीं होती है”।
ऐसे ही हजारों-लाखों निजी रिश्तों में दूरियां आ चुकी हैं। बहुत सी दोस्तियां दुश्मनी का रूप ले चुकी हैं। सिनेमा, साहित्य, संगीत, मीडिया, व्यापार, यूनिवर्सिटीज, कॉमेडियन हर फील्ड दो धङों में बंटा पङा है। आधे टीवी चैनल एक पक्ष में हैं, आधे दूसरे पक्ष में हैं। क्विंट, वायर आदि एक तरफ हैं, ऑपइंडिया जैसे सैंकड़ों पोर्टल दूसरी तरफ हैं। आधे कवि खुद को राष्ट्रवादी घोषित करके ताल ठोंक चुके हैं तो बाकी आधे दाढी बढा कर, गमछा गले में डालकर मोदी को हिटलर और बाकी कवियों को बिका हुआ घोषित करते हुए आजादी मांग रहे हैं। अनुपम खेर, विवेक अग्निहोत्री आदि एक तरफ हैं तो नसीर, स्वरा भास्कर, अनुराग कश्यप आदि दूसरी तरफ हैं। राखी सांवत, कंगना जैसे अवसरवादी टैम-बेटैम पाला बदल रहे हैं। अनुपम खेर नसीरुद्दीन जैसे चार दशक के सहकर्मी भी एक दूसरे पर खुलेआम कीचङ उछाल रहे हैं। यहां तक कि एक फॉर्मल सदाचार भी मेंटेन नहीं रहा दोनों के बीच।
लोग अपनी आईडियोलॉजी के विपक्ष में खङे व्यक्ति से सारे निजी सम्बन्ध ही खत्म करने पर उतारू हैं। यह भयंकर मूर्खता है। बहस करने पर लोग रिश्ते ही खत्म कर ले रहे हैं, मुझे भी कई लोग अनफ्रेंड करके गये हैं। जबकि बहस अच्छी चीज है, करनी चाहिए, बहस करने वाले दोनों लोगों का ज्ञान बढता है। मैं तो अपने दो चार निजी मित्रों के साथ रोज डेढ दो घंटे बहस ना कर लूं तब तक खाना ही हजम नहीं होता मुझे तो। अभी देखिएगा वो नीचे कमेंट में देश बंटने के लिए सिर्फ लेफ्ट और कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराएंगे और फिर हमारी बहस होगी। लेकिन बहस करना लड़ाई करना नहीं होता, इतनी सी बात समझने की है।
परिपक्वता क्या है? परिपक्वता इसमें नहीं है कि आप कितनी अच्छी अच्छी बातें फेसबुक पर लिख पाते हैं या कितने अच्छे अच्छे सुविचार कॉपी पेस्ट करके वाट्सएप फॉरवर्ड करते हैं। परिपक्वता इसमें है कि आप अपने मित्र की आईडियोलॉजी को कितना पचा पाते हैं। परिपक्वता इसमें है कि आप तल्ख बहस के बाद भी अपने मित्र के प्रति निजी कुंठा नहीं पालते। परिपक्वता यह समझने में है कि बहस सिर्फ फेसबुक तक है, सामने वाला अपने विचार रख रहा है, जैसे आप रख रहे हैं। सामने वाले को भी अपने विचार उतने ही सही लग रहे हैं जितने आपको अपने विचार सही लग रहे हैं। ना तो सामने वाला देशद्रोही है, ना सामने वाला बिका हुआ है। बस उसका नजरिया, उसका आकलन, उसकी आईडियोलॉजी अलग है। बहस कीजिए उससे, अपनी आईडियोलॉजी समझाने की कोशिश कीजिए, अपना पॉइंट रखने की कोशिश कीजिए, बस रिश्ते खराब मत कीजिए। मोदी-राहुल सब यहीं रह जाने हैं, आपसे नेटफ्लिक्स का पासवर्ड आपका दोस्त ही शेयर करेगा, दारू भी उसके साथ ही बैठकर पीनी है, कभी पैसों की जरूरत भी पङी तो भी उसे ही फोन करना है। बस इतना याद रखिए बहस करते टाईम।