समाज

हम सभी ने अक्सर सुना ही होगा कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। लेकिन बार बार हजार बार ‘समाज’ शब्द के अनावश्यक प्रयोग से मेरे मन में यह सवाल आया कि ‘समाज क्या है और समाज नामक अवधारणा की सीमाएं क्या हैं?’

निस्संदेह समाज नामक संस्था का उद्भव मनुष्य के हित के लिए ही हुआ होगा.. लेकिन जहां तक मैं समझ पाया हुं, आज हमने समाज का बहुत ही गलत अर्थ ले लिया है। समाज का अर्थ ये कतई नहीं है कि मुझे अपने व्यक्तिगत जीवन में क्या करना है, ये कोई और तय करे। मुझे किस पार्टी या उम्मीदवार को वोट देना है ये मैं तय करुंगा, समाज के नाम पर दुकानें चलाने वाले ठेकेदार नहीं। मुझे सामूहिक विवाह करना है या नहीं करना है, यह मेरा निजी फैसला है, समाज की दुहाई देकर कोई और मेरे इस फैसले में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। मुझे कहां आना-जाना है, किसके साथ रहना है, क्या खाना, पीना, पहनना, सोचना चाहिए ये मैं तय करुंगा, समाज के नाम पर ज्ञान बांटने वाले ज्ञानियों को इसमें हस्तक्षेप करने का भी अधिकार नहीं है। यदि कल को मेरी किसी दुर्घटना में अकाल मृत्यु हो जाए तो मेरी पत्नी को पुनर्विवाह करना है या नहीं, यह निर्णय लेने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ उसका है, किसी भी क्षात्रधर्म(?) के स्वयंभू ज्ञानी को उसके निजी निर्णय पर फतवा जारी करने का अधिकार नहीं है। और हां, मुझे किसी वाट्सएप/फ़ेसबुक ग्रुप में रहना है या नहीं, ये फैसला भी मैं ही करुंगा। कोई भी मुझे समाज की एकता के नाम पर ब्लेकमेल करके नहीं रोक सकता है। हद हो जाती है जब मात्र वाट्सएप ग्रुप छोङने पर लोग कहते हैं कि समाज के लिए इतना भी नहीं कर सकते तो डूब मरो। अब इस बेवकूफ़ी को क्या कहा जाए?
उपरोक्त सिर्फ मेरे ही नहीं हम सब के निजी अधिकार हैं जो कि प्रकृति/ईश्वर द्वारा प्रदान किए गए हैं तथा संविधान द्वारा भी। इन्हें समाज नामक संस्था छीन नहीं सकती है। आप सबको भी मेरे इन विचारों से सहमत या असहमत होने का अधिकार है। और यदि मेरे विचारों से आपको कोई समस्या हो तो मुझसे संबंध-विच्छेद करने का भी आपको अधिकार है (Unfriend का बटन मेरी प्रोफ़ाइल में मिलेगा)। अब कोई आपको बोले कि आपको घनश्याम सिंह के विचारों से सहमत होना ही पङेगा वरना समाज की एकता टूट जाएगी, तो क्या ये उचित है? शायद नहीं। ये खुद को थोपना है।

इसलिए ये समझना महत्वपूर्ण है कि समाज क्या है? दरअसल हम लोग/मनुष्य ही समाज हैं और समाज नामक अवधारणा का जन्म मनुष्य जीवन को बेहतर बनाने के लिए हुआ है, ना कि अनावश्यक बंदिशें लगाने के लिए। इसलिए इसका इस्तेमाल सभी के जीवन को बेहतर और आसान बनाने के लिए कीजिए।
तो फिर प्रश्न यह भी उठता है कि हमें समाज की आवश्यकता क्यों है? क्यों ना हम समाज नामक व्यवस्था को समाप्त कर दें?

नहीं। हमें समाज की आवश्यकता है। जब हमारे ऊपर साझा (Collective) समस्या आए तो उसका साझा प्रत्युत्तर देने के लिए हमें समाज की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए सवर्ण होने की वजह से आपके साथ आरक्षण के नाम पर भेदभाव हो रहा है तो सभी सवर्णों को मिलकर इसे हटाने के लिए साझा प्रयास करने की आवश्यकता है। यदि आप महिला हैं और महिला होने की वजह से आपके किन्हीं अधिकारों पर आंच आए तो महिला समाज बनकर मुकाबला कीजिए। हो सकता है कई बार आप पर हिंदू होने की वजह से कोई साझा समस्या आए तो जरुरत है हिंदू समाज के रुप में संगठित हो कर मुकाबला करने की। यदि आप पर भारतीय होने की वजह से समस्या आए तो सब भारतीय के रुप में संगठित हो कर लङिए। यदि खुदा न खास्ता कभी धरती पर एलियन हमला कर दें तो मानव समाज के रुप में संगठित हो कर मुकाबला कीजिए। मेरे लिए यही समाज की परिभाषा है- साझा समस्याओं का साझा हल ढूंढना। ना कि निजी बंदिशें लगाना या निजी जीवन में हस्तक्षेप करना या बेमतलब की गुटबंदी करना।

समाज की अवधारणा का जन्म ही इसीलिए हुआ है कि हम साझी मुश्किलों का साझा हल ढूंढ सकें। बाकी इसके अलावा हमारी निजी समस्याओं का हल स्वयं हमें ही ढूंढना पङता है। निजी और सामाजिक जीवन को अलग करना सीखिए।
Do I make myself clear now?

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