अब तक 28

..तो 28 गुजर गये। वैसे जन्मदिन कोई खास दिन नहीं होता है, वैसा ही होता है जैसे साल के बाकी दिन होते हैं। बस यह मूल्यांकन करने का दिन होता है अब तक जीये गये सालों का। तो फिलहाल जो कटी ठीकठाक कट गई। हालांकि कुछ उखड़ा नहीं इन 28 सालों के दौरान, अगले 28 साल भी जीया तो कुछ उखड़ पाएगा इसकी उम्मीद नहीं है, कोशिश भी नहीं है। इसलिए अब खुद को उम्मीदों के बोझ से आजाद कर दिया है, कई जिम्मेदारियों से भी। जैसे दुनिया बदलने की, दुनिया को खुश रखने की, दुनिया को समझाने की या दुनिया के सही-गलत तय करने की जिम्मेदारी मेरी नहीं है, तो आजाद कर लिया है खुद को इन सब से। अब तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनिया..

अब लंबी लंबी फ्यूचर प्लानिंग्स भी नहीं करता हुं। फिलहाल बस इतना सोच रहा हुं कि फरवरी-मार्च तक “विशेष” रिलीज हो जाए। जिंदगी में 2-3 फिल्में और बनाने की ख्वाहिश है। पर फिलहाल नहीं, अभी कुछ महीने या कुछ साल नहीं एक बार। बोर सा हो गया हुं “विशेष” के लंबे थका देने वाले सफर से। अभी ईरादा है एक किताब लिखने का (या कुछ और करने का, पता नहीं क्या)। पता नहीं कोई पढेगा भी या नहीं किताब को, पर मूड हो रहा है लिखने का। मूड तो साल भर से हो रहा है, कब लिख पाऊंगा पता नहीं। डैडलाईन जैसा कुछ नहीं है, शायद कभी ना लिख पाऊं।

संतोष की बात यह है कि हर साल खुद को पहले से बेहतर महसूस करता हुं। हर बार लगता है कि पहले की तुलना में कई नई चीजें सीख समझ गया हुं इस साल के दौरान। बस ये काफी है।

खैर.. जो हुआ, वो अच्छा हुआ या नहीं भी हुआ, उसको बदला नहीं जा सकता तो टेंशन लेने की जरूरत नहीं अब। जो हो रहा है वो तो खैर अच्छा हो ही रहा है, तभी तो पोस्ट लिखने का समय मिल पा रहा है। और जो होगा, वो जब होगा तब देखा जाएगा।
बाकी रामजी भली करें।

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