ज्ञान गोळ है
बचपन में सुना था कि ज्ञान गोळ है। कैसे है यह कल समझ में आया।
मणिरत्नम की फिल्म ‘दिल से’ देख रहा था जो कि आजादी की मांग कर रहे राज्यों पर आधारित है यथा मणिपुर, कश्मीर। फिल्म पूरी होने के बाद क्रेडिट में शाद अली का नाम दिखा असिस्टेंट डायरेक्टर में। काफी दिनों से शाद अली का नाम सामने आया था तो गूगल किया कि आजकल क्या कर रहे होंगे? वहां से उनकी मां का नाम सुहासिनी अली और Grandparents का नाम लक्ष्मी सहगल और प्रेम सहगल दिखा।
लक्ष्मी सहगल ने ध्यान खींचा कि कहीं यह वही लक्ष्मी सहगल तो नहीं जो नेताजी की आजाद हिंद फौज में महिला विंग की कैप्टन लक्ष्मी थी? खोला तो देखा वही थी। उनके बारे में पढते पढते पता चला कि उन्होंने बाद में वामपंथी पार्टी CPI(M) जॉइन कर ली थी और लेफ्ट के नामांकन पर अब्दुल कलाम के खिलाफ राष्ट्रपति का चुनाव भी लड़ा था और उनकी बेटी सुहासिनी अली यानी शाद अली की मां CPI(M) की पोलित ब्यूरो मेंबर है।
खैर.. यह भी पता चला कि लक्ष्मी ‘सहगल’ बनने से पहले वो एक शादी पायलट PKN Rao से कर चुकी थीं और उससे भी पहले वो लक्ष्मी ‘स्वामीनाथन’ थी। उनके पिता सुब्बराम स्वामीनाथन एक प्रसिद्ध वकील थे और तमिल अय्यर ब्राह्मण थे और उनकी मां ए.वी. अम्माकुट्टी नायर थीं। रोचक नई जानकारी यह मिली कि नायर/नैय्यर कोई एक जाति ना हो कर जातियों का समूह था जिसमें कई जातियां थी, जैसे वर्तमान में OBC, SC, ST आदि हैं। साऊथ में कुछ ब्राह्मणों में प्रथा थी कि सिर्फ बड़ा बेटा ही ब्राह्मण कन्या से शादी करके वंश चला सकता था बाकी नहीं, ताकि घर की संपत्ति का बंटवारा ना हो। बाकी बेटे नायर लड़कियों से “सम्बन्धम्” कर सकते थे। “सम्बन्धम्” थोड़ा थोड़ा राजस्थान के ‘नाता’ प्रथा जैसा था इसमें शादी नहीं होती थी। लड़की अपने घर पर ही रहती थी और उसके बच्चे होने पर भी वो बच्चे नायर ही होते थे यानी कि वो अपने मां के घर में ही रहते थे पिता का उन पर कोई अधिकार नहीं होता था। दोनों में से कोई भी शख्स जब मर्जी हो “सम्बन्धम्” को तोड़कर किसी दूसरे से सम्बन्धम् कर सकता था, कोई तामझाम नहीं था। एक लड़की एक से अधिक “सम्बन्धम्” रख सकती थी।
खैर.. एस. स्वामीनाथन साहब वकालत पढने के लिए लंदन चले गये थे और वापस लौटे तो उम्र ज्यादा होने की वजह से कोई हमउम्र लड़की नहीं मिली। तो उन्होंने नायर कन्या अम्माकुट्टी से सम्बन्धम् किया और फिर लंदन वापस जाकर इसे विवाह के रूप में पंजीकृत करवाया। अम्माकुट्टी/अम्मू स्वामीनाथन पढी लिखी नहीं थी, फिर उन्होंने कांग्रेस जॉइन की। भारत की संविधान सभा की सदस्य रहीं और फिर लोकसभा तथा राज्यसभा सदस्य भी।
खैर.. लक्ष्मी सहगल के अलावा उनकी एक और बेटी थीं जो डांसर थी, मृणालिनी साराभाई। विक्रम साराभाई की पत्नी। वही प्रसिद्ध साइंटिस्ट विक्रम साराभाई जिन्होंने ISRO और IIM की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
साराभाई परिवार पढना शुरु किया तो पता चला कि विक्रम साराभाई के पिता अम्बालाल साराभाई बहुत बड़े उद्योगपति थे और गांधी के बेहद करीबी थे (थोड़ा प्रेक्टिकल शब्द इस्तेमाल करें तो गांधी के स्पॉन्सर थे)। अम्बालाल साराभाई की कई सारी मिलें (Mills) थीं और उनकी बहन अनुसुईया साराभाई London School of Economics से पढकर मिलों के मजदूर यूनियन की लीडर थीं। ये महात्मा गांधी की मित्र और शिष्या थीं और गांधी इन्हें “पूज्य” (पूजनीय) मानते थे। इन्होंने अहमदाबाद और साबरमती आश्रम सेटअप करने में गांधी की बहुत मदद की और गांधी ने इनको ‘मजदूर महाजन संघ’ का आजीवन अध्यक्ष बनाया (अपने अपने पॉलिटिकल आइडियोलॉजी के हिसाब से लॉजिक ढूढंते चलिए)।
खैर.. अम्बालाल साराभाई के तीन बेटों और पांच बेटियों में से एक थीं मृदुला साराभाई, विक्रम साराभाई की बड़ी बहन। पूरे साराभाई परिवार की तरह ये भी गांधीजी के साथ थीं। फिर गांधी की हत्या के बाद इनका धीरे धीरे कांग्रेस और नेहरू से मोहभंग हो गया। और ये शेख अब्दुल्ला की बहुत अच्छी दोस्त और सपोर्टर थीं। 1959 में जब शेख अब्दुल्ला पर Kashmir Conspiracy Case हुआ तो इन्होंने शेख अब्दुल्ला के लिए पैसों की फंडिंग भी की और कुछ महीनों के लिए इन्हें भी उसी केस में जेल में डाला गया।
खैर.. Kashmir Conspiracy Case पढना शुरु किया तो पता चला कि शेख अब्दुल्ला को 1953 में प्रधानमंत्री पद से बर्खास्त करके देशविरोधी गतिविधियों के लिए गिरफ्तार किया गया। बीच में कुछ समय रिहा कर दिया गया। उन पर पाकिस्तान के साथ मिलकर कश्मीर पर हिंसक तरीके से कब्जा करके पाकिस्तान में मिलाने की योजना बनाने का आरोप था, जिसके बदले में पाकिस्तान द्वारा काफी बड़ी धनराशि, विस्फोटक और टाईपराईटर आदि दिए जाने के साक्ष्य कोर्ट में दिखाए गए। जिसके बाद पक्के सबूत, डॉक्यूमेंट्स, अब्दुल्ला के भाषणों की टेप्स आदि इंटेलिजंस एजेंसियों द्वारा प्रधानमंत्री नेहरू के पास प्रस्तुत किए गए। ये सबूत देखकर और अब्दुल्ला का पाकिस्तान से पत्राचार पढकर नेहरूजी को बहुत बड़ा “धक्का” लगा, उन्हें अपने अजीज मित्र शेख अब्दुल्ला से यह उम्मीद नहीं थी। आखिरकार उन्होंने अब्दुल्ला और 23 अन्य पर मुकदमा चलाए जाने की अनुमति दी। 1959 में नेहरू जी के अजीज मित्र शेख अब्दुल्लाह के खिलाफ ट्रायल शुरु हुआ और 1962 में केस हाईकोर्ट में ट्रांसफर हो गया, जिसकी सजा IPC के तहत मृत्युदंड अथवा आजीवन कारावास थी। अप्रेल 1964 में जब सारा देश इस केस का फैसला सुनने के लिए इंतजार कर रहा था, तभी अचानक भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और कश्मीर के प्रधानमंत्री गुलाम मोहम्मद सद्दीक ने एक डिप्लोमेटिक डिसीजन के तहत केस वापस ले लिया और शेख अब्दुल्ला को रिहा कर दिया गया (मोदीजी से पहले नेहरूजी को भी कूटनीतिक मास्टरस्ट्रोक्स मारने का शौक था)। गुलाम मोहम्मद सदीक पहले शेख अब्दुल्ला के प्रधानमंत्री काल में मंत्री रह चुके थे और फिर कांग्रेस में आ गए।
जेल से रिहा होते ही पूरे कश्मीर में अब्दुल्ला का ऐतिहासिक स्वागत किया गया। (असली जेल में नहीं थे, मदुरैई से 120km दूर एक हिल स्टेशन कोडाईकैनाल में कोहिनूर बंगले में परिवार सहित थे, लेकिन सिर्फ म्यूनिसिपल सीमा में बेरोकटोक घूमने की अनुमति थी। बाद में मार्च 1984 में फारूख अब्दुल्ला और MG रामचंद्रन की उपस्थिति में हुए एक समारोह में इस बंगले का नाम बदलकर ‘कोहिनूर शेख अब्दुल्ला बंग्लो’ रख दिया गया)। अप्रेल में जेल से रिहा हुए शेख अब्दुल्ला को फिर नेहरूजी ने मई में कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अयूब खान से बात करने के लिए पाकिस्तान भेजा, जहां हर जगह अब्दुल्ला का हीरोइक स्वागत हुआ और उन्होंने अयूब खान को (पता नहीं किस हैसियत से) दिल्ली आने का न्यौता दिया। अयूब खान ने उनका न्यौता स्वीकार करते हुए जून 1964 में भारत आने का वादा किया। लेकिन प्रस्तावित कार्यक्रम के कुछ ही दिन पहले 27 मई को अयूब खान PoK के दौरे पर थे तभी नेहरूजी की मृत्यु हो गई और इस प्रकार कश्मीर समस्या का स्थाई समाधान होते होते रह गया (जैसा कि नेहरू समर्थकों का दावा है)।
खैर.. मेरे कहने का मतलब यह था कि ज्ञान गोळ है। एक जगह से शुरु होकर फिर घूमकर वहीं आ जाता है। कश्मीर से चला था वापस कश्मीर पर आ गया। सब मोहमाया है।
