क्रिकेट और मैच्योरिटी
1999 का विश्वकप था, ग्रुप मैच में जिम्बाब्वे से हारने की वजह से भारत को सुपर-6 में सारे मैच जीतने थे सेमीफाइनल में क्वालिफाई करने के लिए। पहला मैच था ऑस्ट्रेलिया से। उस समय ऑस्ट्रेलिया से मैच होता उसे काऊंट नहीं किया जाता था, पहले ही हारा हुआ माना जाता था। इसलिए भारत की जीत की उम्मीद भी नहीं थी, नहीं जीते। मेरी उम्र उस समय 9 साल थी, क्रिकेट देखने का शुरुआती दौर था, ज्यादा दुख नहीं हुआ।
2003 का विश्वकप: फाइनल में ऑस्ट्रेलिया से मुकाबला था, जीत की उम्मीद नहीं थी लेकिन किसी चमत्कार की उम्मीद थी। एक बार थोड़ी बारिश आई भी लेकिन अंततः पोंटिंग की पारी ही बारिश पर भारी पड़ी।
मैं उस समय 13 साल का था, जोरदार बारिश आने की प्रार्थना करते हुए सवामणी तक बोली। लेकिन ना तो उस 23 मार्च की काली रात को बारिश आई और ना ही बाद में नींद। बहुत दुख हुआ, हफ्ते भर तक दिमाग से नहीं निकला।
2007 का विश्वकप: ग्रेग चैपल जी की मेहरबानी से टीम का जो प्रदर्शन रहा, नफरत ही हो गई मैच देखने से। उस समय 17 साल का था, दुख से ज्यादा मोहभंग हो गया क्रिकेट से।
2011 का विश्वकप: एकाध मैच देखा, सेमीफाइनल और फाइनल देखा.. भारत जीत भी गया।
21 साल की उम्र थी, हल्की फुल्की खुशी सी हुई कि चलो बढिया है बचपन का एक अरमान तो पूरा हुआ। हालांकि उस टाईम तक आते आते वो अरमान प्रायोरिटी लिस्ट में इतना नीचे जा चुका था कि नहीं भी पूरा होता तो कोई खास फर्क नहीं पड़ता।
2015 का विश्वकप: 25 की उम्र थी, देखा नहीं वर्ल्डकप। पता ही नहीं चला कब हुआ। IPL और इतने सारे ICC इवेंट्स होने लगे कि एक्साइटमेंट ही नहीं बची।
2019 का विश्वकप: 29 की उम्र। देखा नहीं एकाध ओवर्स के अलावा। इच्छा नहीं हुई। इंडिया शायद सेमीफाइनल तक गई थी।
2023 का विश्वकप: सेमीफाइनल और लीग स्टेज के 4-5 मैच देखे इंडिया के। अच्छा खेले, बहुत मजा आया। पहली बार जीतने की इतनी पुख्ता दावेदारी और उम्मीद थी, लेकिन फाइनल हार गए।
33 की उम्र हो चुकी है, दुख या खुशी कुछ नहीं हुआ। इस वर्ल्डकप के मैच इंडियन टीम की बजाय क्रिकेट के पॉइंट ऑफ व्यू से देखे। किसी शानदार गेंद पर भारतीय बल्लेबाज भी आऊट हुआ तो मजा आया, विपक्षी बल्लेबाज ने बढिया छक्का भी मारा तो एंजॉय किया। कल दोपहर बाद याद आया कि आज फाइनल है, श्रेयस के आऊट होने के बाद से देखा। एकदम बुद्धत्व के भाव से जैसे कि न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के बीच चल रहा हो मैच। गुस्सा, दुख, खुशी कुछ नहीं फील हुआ एक बार भी। जैसे कोई फिल्म देखते हैं वैसे मैच देखकर बंद किया और मस्त नींद आई। सुबह याद भी नहीं रहा, दोपहर में फेसबुक खोला जो पूरा आंसूओं के सैलाब से भीगा पड़ा था। मैच से ज्यादा दुख इस बात का हुआ कि कैसा पत्थर दिल आदमी हो गया हुं, भारत फाइनल हार गया तो भी दुख नहीं हो पा रहा है 😀
अभी गौर कर रहा था तो महसूस हुआ कि ये क्रिकेट वर्ल्डकप की टाईमलाइन नहीं बल्कि मेरे जीवन का “मैच्योरिटी ग्राफ” है, 9 साल से 33 साल तक का। सेम यही ग्राफ चुनावों में भी रहा है। जयललिता द्वारा समर्थन वापस लेने की वजह से अटल जी की 13 महीने की सरकार गिरने के बाद दूरदर्शन पर अटल जी को इस्तीफा देकर निकलते देखने से लेकर 2023 चुनाव तक यही सेम जर्नी इसी तरह से होते हुए इसी स्टेज पर है, कि अब किसी हार जीत से कोई लेना देना नहीं रहा। क्रिकेट और राजनीति दोनों का Fanडम/चस्का जाता रहा।
अच्छा या बुरा जो भी है, अब यही है।