एक थी क्रांति
बात सन 1857 की है। भारत देश में पहली बार क्रांति पैदा हुई। लेकिन समस्या यह थी कि क्रांति ‘सतमासी’ पैदा हो गई, अंग्रेजी में कहुं तू ‘प्रीमैच्योर’ यानि कि डिलीवरी समय से पहले हो गई। सुना है कि किसी मंगल पांडे नामक कम्पाऊंडर ने डॉक्टरों के अनुमति के बिना ही ऑपरेशन कर दिया। खैर उस जमाने में वेंटिलेटर जैसी सुविधाएं तो थीं नहीं, तो नवजात क्रांति ने तुरंत दम तोड़ दिया।
समय गुजरता गया। कई बार अफ़वाहें आती रहीं कि क्रांति जी का पुनर्जन्म होने वाला है, लेकिन गांधी-नेहरु नामक दो अंग्रेजी डॉक्टरों ने क्रांति जी को पैदा होने नहीं दिया। अंग्रेजों द्वारा ‘बलात्कार’… माफ़ कीजिए… अत्याचार करने पर जब भी जनता गर्भवती होती और क्रांति के पैदा होने की संभावना बनती, गांधीजी अहिंसा का इंजेक्शन देकर गर्भपात करवा देते। वैसे भी क्रांति कोई साऊथ की फ़िल्म की नायक तो है नहीं कि तुरंत पुनर्जन्म ले ले और तुरंत पूर्वजन्म में की गई खुद की हत्या का बदला ले ले। क्रांति को पैदा होने में समय तो लगता ही है ना जनाब, और इसी तरह समय गुजरता गया और 1943-44 आते आते क्रांति के हत्यारे अंग्रेजों को हिटलर नामक जर्मनी के एक शख्स ने घर में घुसकर इतना धोया, इतना धोया कि उन्होंने दो-तीन साल में ही भारत जैसे देशों से अपना बखेरा समेट कर अपने घर की खाट पकड़ ली। और क्रांति जी का अंग्रेजों से प्रतिशोध लेने का अरमान अधूरा रह गया।

जिस तरह घर में नई नवेली दुल्हन के आने बाद मां-बाप की होती है, उसी प्रकार अंग्रेजों के जाने के बाद क्रांति जी की आवश्यकता ही समाप्त हो गई और लोग नई नवेली आजादी के साथ आनंदमग्न हो गए। और जिस तरह शादी के बाद बेटा मां की छत्रछाया से निकल कर पत्नी का गुलाम हो जाता है, ठीक वैसे ही देश भी अंग्रेजों की गुलामी से निकल कर गांधी-नेहरु परिवार की छत्रछाया में चला गया।
अध्याय 1: क्रांति प्रगटन एवं ‘कजरी’ द्वारा अपहरण
वक्त के साथ साथ शासन करने वालों के नाम और शक्लें बदलती रहीं, नहीं बदला तो उनका ‘गांधी’ उपनाम और देश की जनता के हालात। आखिरकार 60-65 सालों बाद देश को समझ में आ ही गया कि गंगाधर ही शक्तिमान है। और 4 अप्रेल 2011 को जंतर मंतर से घोषणा हुई कि भ्रष्टाचारियों द्वारा बार बार बलात्कार किए जाने की वजह से जनता फ़िर से गर्भवती है, क्रांति जी गर्भ में है और किसी भी वक्त जन्म ले सकती हैं। देश के सारे डॉक्टर रामलीला मैदान में क्रांति के अन्ना… सॉरी सॉरी… क्रांति की अम्मा के पास इकट्ठा हो चुके थे।
देश की जनता को एक बार तो यकीन ही नहीं हुआ कि सच में क्रांति का जन्म होने वाला है, परन्तु फ़िर अम्मा के पर्सनल ‘डॉक्टर कुमार’, जिन पर जनता को अत्यधिक ‘विश्वास’ था, ने घोषणा की कि उन्होंने खुद अम्मा का चेकअप किया है और ये खबर सच है, तब जाकर जनता को यकीन हुआ। मीडिया भी इस ऐतिहासिक पल का भरपूरा मजा लेना चाहता था इसलिए उसने भी क्रांति के स्वागत के लिए पूरी तैयारियां कर लीं। इसी बीच एक दिलचस्प खबर आई कि क्रांति अम्मा के पेट से नहीं बल्कि किसी बाबा ‘नामदेव’ के पेट से पैदा होने वाली है। लेकिन सलवार उठाकर देखा तो पता चला कि जिन उल्टियों की वजह से बाबा खुद के गर्भवती होने का वहम कर रहे थे, वो दरअसल क्रांति पेट में होने से नहीं बल्कि ‘तिलांजलि’ ब्रांड की दवाईयां खाने से हो रही थी।

खैर क्रांति ने अम्मा को ही चुना और आखिरकार डॉ. कुमार के हाथों लगभग ‘डैढ सौ साल’ के बाद क्रांति जी का पुनर्जन्म हुआ। लेकिन सदियों पहले गांधीजी द्वारा दी गई दवा का ‘साइड इफ़ेक्ट’ था या पता नहीं क्या था, इस बार क्रांति जी अहिंसक पैदा हुई। (वरना विदेशों में तो क्रांति के प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव होता है) लेकिन जैसी भी हो क्रांति पैदा तो हो चुकी थी, पूरे देश में ‘मथुरा में कृष्ण जन्म’ का सा माहौल हो चुका था। लोग अम्मा जैसी टोपियां पहनकर सड़कों पर निकल आए। क्रांति की स्तुतियां व्हाट्सएप और फ़ेसबुक पर गाई जाने लगीं। भ्रष्टाचारियों ने कंस मामा की तरह ‘नवजात क्रांति’ को समाप्त करने के प्रयास तेज कर दिए। आए दिन दूधमुंही क्रांति का कत्ल करने के कुत्सित प्रयास होने लगे। क्रांति के अंगरक्षकों को चिंता सताने लगी कि नवजात क्रांति भ्रष्टाचारियों के तेज हमलों के बीच और इस खराब मौसम में रामलीला मैदान में खुले में ‘सर्वाइव’ नहीं कर पाएगी। इसलिए जनता से राय ली गई कि क्रांति पैदा तो हो गई है परन्तु इसे जिंदा रखने के लिए रामलीला मैदान से शिफ़्ट करना जरुरी है। क्रांति की अम्मा इसके पक्ष में नहीं थी, उसे डर था कि मासूम सी क्रांति शहर के धूर्त लोगों के द्वारा मार दी जाएगी या उनके हाथों की कठपुतली बनकर रह जाएगी, इसलिए अम्मा ने विरोध किया। लेकिन 2 अक्टूबर 2012 को घोषणा हुई कि क्रांति को शहर पहुंचाना ही होगा, चाहे अम्मा साथ जाए या ना जाए। वासुदेव की भूमिका अम्मा की एक प्रमुख सहयोगी आया ‘कजरी’ को दी गई जिसका क्रांति का प्रसव कराने में अहम योगदान था। 26 नवम्बर को ‘कजरी’ पन्ना धाय की भांति क्रांति को कचरे की टोकरी में छिपाकर शहर में ले आई और मीडिया तथा लोगों का हुजूम भी क्रांति के जयकारे लगाते हुए अम्मा को रामलीला मैदान में अकेले भीगने के लिए छोड़कर क्रांति के साथ शहर आ गया। कालांतर में मासूम क्रांति ने इसी ‘कजरी’ को अपनी असली मां समझ लिया।

अध्याय 2: इंद्रप्रस्थ का प्रथम युद्ध
डॉ. कुमार भी अब क्रांति के पर्सनल चिकित्सक बन चुके थे और वो भी क्रांति के साथ शहर आ गए (हालांकि बीच बीच में ये कभी-कभार ‘अम्मा’ का चेकअप करने जाते रहते थे)। उन्होंने एक दिन चेकअप के बाद घोषणा की कि 1 साल की नवजात क्रांति अपने 128 साल पुराने और शक्तिशाली कं’Grey’स मामा के खिलाफ़ मैदान में उतरने को तैयार है। क्रांति जी कंस मामा का वध करेंगी और फ़िर दिल्ली के सिंहासन पर विराज कर जनता दरबार लगाएंगी और जनता का दुख दर्द दूर करेंगी।
निश्चित समय पर मैदान में घमासान हुआ और ‘कजरी’ ने बैराम खां बनकर ‘क्रांति’ की तरफ़ से सेना का नेतृत्व किया। कंस मामा की सेना बुरी तरह पराजित हुई, परन्तु दोनों की इस लड़ाई का फ़ायदा तीसरे ने उठाया और 32 गांव लूट लिए। अब ‘कजरी’ को 32 गांवों पर कब्जा जमाए बैठे लुटेरे का डर सताने लगा तो उसने कंस मामा (जिनके अब सिर्फ़ 8 दांत सलामत थे) का सिर कलम करके ‘क्रांति’ को ‘गाजी’ की उपाधि देने की बजाय कमजोर हो चुके कंस मामा और क्रांति के बीच संधि करवा दी और दिल्ली के सिंहासन पर कंस मामा की गोदी में क्रांति को बैठा दिया। लेकिन 49 दिनों में ही कंस मामा के यौन शोषण से तंग आकर क्रांति विधानसभा से निकलकर भाग गई और गायब हो गई।
अध्याय 3: वाराणसी कांड
कुछ महीनों तक ढूंढने के बाद क्रांति वाराणसी में पाई गई। किसी ने पूछा यहां क्या कर रही हो? जवाब मिला कि “विधानसभा बहुत छोटी और ‘बोरिंग’ जगह है, इसलिए अब संसद में रहना चाहती हुं, सुना है वहां कॉफ़ी 1 रुपए में और खाना 12 रुपए में मिलता है।“ लोगों ने समझाया कि तुम अभी अबोध मासूम हो और सामने से ‘लहर’ आ रही है, अच्छा होगा तुम अभी वाराणसी से निकल लो। एक तो इतनी मुश्किल से इस देश में पैदा हुई हो, इतनी कमजोर हो अभी वैसे भी, इस लहर में बिना मतलब के उखड़ जाओगी, 5-7 साल इंतजार कर लो, ऐसी लहरें तो हर 15-20 साल बाद आती हैं और चली जाती हैं, परन्तु तुम तो क्रांतिदेवी हो… मुश्किल से सदियों में एक बार अवतरित होती हो, इस ‘लहर’ को गुजर जाने दो, तब तक तुम शक्तिशाली भी हो जाओगी, तब बेटोक संसद में जाना और आराम से बैठकर ‘पॉर्न’ फ़िल्में देखना। लेकिन क्रांति तो छोटी नासमझ बच्ची की तरह जिद पकड़ कर बैठ गई कि नहीं मुझे तो अभी के अभी संसद में जाना है। अब संसद कोई बाथरुम तो है नहीं कि अभी दिल में आया और अभी हो आए। फ़िर पता नहीं अचानक कोई लहर की चेतावनी देने वाला आया, क्रांति को दो थप्पड़ मारे और ‘मफ़लर’ में लपेट कर वापस दिल्ली जाने वाली ट्रेन में धर दिया।

दिल्ली आने के बाद क्रांति कुछ दिनों तक वाराणसी वाली मार को भूल नहीं पाई और अपने गाल को सहलाती हुई उदास उदास सी घूमती रही। कई बार वापस कंस मामा के साथ विधानसभा में घुसने का प्रयास किया, लेकिन बात बनी नहीं। कभी गुस्से में तो कभी हताशा में इधर उधर टकराती रहीं। कई ‘शाजियों’ को क्रांति की नादानियों और बेवकूफ़ियों का ‘इल्म’ हो गया, तो वो क्रांति से कट्टी करके चले गए।

अध्याय 4: इंद्रप्रस्थ का द्वितीय युद्ध एवं ‘कंस’ वध
और इसी दौरान अचानक एक दिन फ़िर से युद्ध का बिगुल बज गया। कंस मामा तो इस बार भीष्म पीतामह के माफ़िक ‘मृत्युशैय्या’ पर पड़े थे, इस बार क्रांति का सीधा मुकाबला ‘लहरी’ चाचा से था जिनकी सेनापति ‘करण भेदी’ थी। ‘करण भेदी’ क्रांति की रग रग से वाकिफ़ थी और उसके सारे राज जानती थी क्योंकि क्रांति का प्रसव कराने वाले डॉक्टरों में ये भी प्रमुख थीं। लेकिन क्रांति द्वारा ‘कजरी’ को मां मान लिए जाने की वजह से ये क्रांति से बहुत खफ़ा थीं। इसी नाराजगी का फ़ायदा उठाते हुए ‘लहरी’ चाचा ने इन्हें अपना ‘सेनापति’ नियुक्त किया था। सबको लग रहा था कि बिचारी अबला क्रांति का ये आखिरी युद्ध है, ‘लहरी’ चाचा और ‘करण भेदी’ की विशाल सेना मिलकर 2 साल की छोटी सी मासूम क्रांति को नेस्तनाबूद कर देंगे। लेकिन युद्ध के दौरान सेनापति ‘करण भेदी’ की गलतियों का खामियाजा ‘लहरी’ चाचा की पूरी सेना को भुगतना पड़ा और उसकी सारी सेना तितरबितर हो गई और सारे हाथी-घोड़े मारे गए, केवल 3 अश्वधारी बचे जिन्हें क्रांति की सेना द्वारा विधानसभा में नजरबंद कर लिया गया। साथ ही ‘कंस’ मामा से बदला लेते हुए क्रांति जी ने ‘झाड़ू’ से उनका गला रेत दिया और दिल्ली विधानसभा के पास 10 जनपथ के नजदीक दफ़ना दिया।

अध्याय 5: क्रांति का मातृत्व परीक्षण
इस प्रकार क्रांति जी की जोरदार विजय हुई और वो पूरे जोरशोर के साथ विधानसभा के सिंहासन को उखाड़कर अपने जन्म-स्थान रामलीला मैदान में ले आई और उस पर विराजमान हुई। हम जैसे बुड़बक समझे कि हिंदी फ़िल्मों की तरह Happy Ending हो गई और कहानी समाप्त हो गई, लेकिन हिंदी फ़िल्मों में भी तो आजकल सीक्वल बनने लग गए हैं। ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर 2’ की तरह असली मजा तो अब आने वाला था। अब शुरु हुआ क्रांति के ‘मातृत्व परीक्षण’ का दौर। ‘यादवजी’ नामक एक दाढी वाली सेविका ने दावा किया कि क्रांति की असली मां ‘कजरी’ नहीं बल्कि वो हैं। ‘अशांत भीषण’ नामक एक अन्य सेवक और उसके पिता (जो कि क्रांति के प्रसव के समय लालटेन थामे खड़ा था) ने भी यादवजी का समर्थन किया। काफ़ी छीना-झपटी हुई जिसके दौरान क्रांति तो ‘कजरी’ की ही गोदी में रह गई परन्तु ‘यादवजी और अशांत भीषण’ क्रांति की टांग तोड़कर अपने साथ लेकर भाग निकले और पंजाब जा ठहरे। हालांकि सूत्रों के अनुसार कुछ महीनों बाद 29 जुलाई 2015 (30 जुलाई 2015 को आकूब मेमने को फ़ांसी होने वाली थी) की रात को 2 बजे उन्हें उस टांग को टॉर्च की तरह इस्तेमाल करते हुए सुप्रीम कोर्ट के आसपास घूमते हुए देखा गया।
अध्याय 6: ‘कजरी’ से मनमुटाव
उधर क्रांति भी अब अकबर (अरे वही जोधा-अकबर वाला) की तरह जवान होती जा रही थी। उसे भी अब ‘कजरी’ में बैराम खां नजर आने लगा था। क्योंकि उसके दरबार में उसके बजाय कजरी की जय जयकार के नारे अधिक लगते थे और सब मंत्री और दरबारी उससे ज्यादा ‘कजरी’ के प्रभाव में थे। क्रांति ने एक बार जनता की समस्याएं सुलझाने के लिए जनता दरबार भी लगाना चाहा परन्तु ‘कजरी’ ने प्रस्ताव निरस्त कर दिया। क्रांति अपने लिए एक पी.ए. ‘जनलोकपाल’ की मांग करती रही परन्तु ‘कजरी’ ने क्रांति की इस मांग पर कोई ध्यान नहीं दिया। ‘कजरी’ द्वारा बिजली-पानी मुफ़्त में लुटाने से मुफ़्तखोरी बढने लगी और खजाना खाली होने लगा। एक तरफ़ सरकारी खजाना खाली हो रहा था और दूसरी तरफ़ ‘कजरी’ की अय्याशियां बढती ही जा रही थी, उसका तो ‘लाईट बिल’ भी लाखों में आ रहा था। ‘कजरी’ की बीमारी (खांसी की) और सुरक्षा का खर्च भी दिन-ब-दिन बढता ही जा रहा था। क्रांति कुछ दिनों तक तो मजबूरी में मूकदर्शक बनी रही, परन्तु फ़िर उससे यह बर्दाश्त नहीं हुआ तो उसने डॉ. कुमार (जो कि क्रांति के पक्के वफ़ादार थे परन्तु राजवैध्य होने की वजह से मजबूर थे) से राय ली। डॉ. कुमार ने क्रांति को समझाया कि “यदि जिंदा रहना चाहती हो तो मेरी तरह नासमझ बनकर रहो और चुप रहो, वरना ये बेरहम लोग तुम्हारा कत्ल करने में देर नहीं लगाएंगे, तुम चिंता मत करो मैं तुम्हें शिकायत करने के लिए ‘दिल्ली महिला आयोग’ के पास लेकर चलूंगा, वहां मेरी अच्छी जान पहचान है, क्योंकि मेरा आना जाना लगा रहता है।“

अंतिम अध्याय: कथा क्रांति मरण की
एक बार डॉ. कुमार अपनी पुरानी पेसेंट कविता जी (डॉ. कुमार क्रांति के पैदा होने से पहले से ही ‘कविता’ जी के फ़ैमिली डॉक्टर थे) का चेकअप करने के लिए मेल्बर्न गए हुए थे। पीछे से अल्हड़ नादान क्रांति के किसी ‘आशीष शैतान’ ने कान भर दिए कि तुम बिहार जा कर शरण ले लो, वहां तुम्हारी स्वर्गवासी बड़ी बहन ‘समाजवती’ के बेटों ‘बत्तीस तू’मार और भालू प्रसाद’ का साम्राज्य है। एक दिन ‘कजरी’ राज्य में नहीं होने पर बेचारी क्रांति मौका देखकर भाग निकली कैद से और लंगड़ाते हुए आ पहुंची बिहार अपने भांजों (बहन के पुत्र) के पास। उसे लगा कि उसके भांजे उसे देखकर अतिप्रसन्न होंगे और उसके पैर छूकर उसे कंधों पर उठा लेंगे। लेकिन जैसे ही क्रांति अपने भांजों की महफ़िल में पहुंची तो उसने देखा कि उसके भांजे तो पहले ही ‘कजरी’ को गोदी में बैठा चुके थे। और दोनों भांजे अपनी खुद की मां ‘समाजवती’ का ‘जातिवाद’ के हथियार से किए गए कत्ल का तरीका ‘कजरी’ को समझा रहे थे। ‘कजरी’ को भी अब सिंहासन तक पहुंचने के बाद ‘क्रांति’ की आवश्यकता नहीं रही थी और वो भी ‘क्रांति’ को रास्ते से हटाने के लिए कोई ‘वाद’ सीख रही थी। अपने कत्ल की साजिश क्रांति ने दरवाजे के पास खड़ी हो कर चुपचाप सुन ली। अब उसने यहां से चुपचाप भागकर जान बचाना ही उचित समझा। लेकिन वो जैसे ही मुड़ी, ‘लालटेन’ से टकरा गई (अरे यार वैसे ही जैसे हिंदी फ़िल्मों में होता है) और बत्तीस तू’मार, भालू प्रसाद और कजरी ने उसे देख लिया। अब क्रांति वहां से सरपट दौड़ पड़ी (शायद पश्चिम बंगाल में शरण लेने के लिए) और वो तीनों दरिंदे उसके पीछे। अभी उत्तरप्रदेश ही पहुंची थी एक ‘हाथी’ से बचने की कोशिश में एक ‘साइकिल’ की चेन में अपना दुपट्टा फ़ंसा बैठी और पीछे से बत्तीस तू’मार ने खींच कर ‘तीर’ मारा और क्रांति जी चित्त। राम नाम सत्य ।।
तो इस प्रकार क्रांति जी का वध हुआ और इस खुशी को ‘सिलेब्रेट’ करने के लिए क्रांति के हत्यारों द्वारा ‘अभिमान’ रैली का आयोजन किया गया, जिसमें मामा ‘कंस’ के बचे-खुचे ‘अवशेषों’ की भी पूजा की गई और साथ ही साथ उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उनकी अस्थियों को गंगा में प्रवाहित किया गया।

देश में इतना सब हो गया, 150 साल के इंतजार के बाद पैदा हुई क्रांति का वध हो गया और देश की जनता को कोई खबर तक नहीं लगी। क्योंकि देश की जनता उस वक्त ‘लहरी’ चाचा द्वारा बांटी गई ‘कच्चे दिनों’ सॉरी सॉरी ‘कच्चे आम’ की टॉफ़ी सूंघकर मदहोश हो रखी थी और आरक्षण-आरक्षण खेल रही थी। ऊपर से ‘लहरी’ चाचा ने बहलाए रखने के लिए क्रांति के परिजनों को ‘सवा लाख करोड़’ रुपए और एक ‘कमल का फ़ूल’ मुआवजे के तौर पर भेंट कर दिया। अब सिर्फ़ इंतजार इस बात का है कि डॉक्टर कुमार साहब मेल्बर्न से आकर क्रांति की हत्या पर दो शब्द कहेंगे या फ़िर भीष्म पितामह की तरह अपना राजधर्म निभाना जारी रखते हुए क्रांति का चीरहरण करने वाले कौरवों का साथ देना जारी रखेंगे?
‘कंस’ मामा को मिटाकर क्रांति ने अपना बदला तो ले लिया। परन्तु उनके प्रति उनकी मां जनता की उदासीनता ने उनके दिल में जनता के प्रति नफ़रत पैदा कर दी है। और जिस बेरहमी से यह नृशंस हत्या हुई उसने क्रांति जी के मन में इतना खौफ़ पैदा कर दिया है कि वो कम से कम अगले सौ-पचास सालों तक तो पुनर्जन्म लेने का सोचेंगी भी नहीं। मुबारक हो, अब हम जनता के साथ बार बार ‘सामूहिक बलात्कार’ होते रहेंगे पर हमें बचाने के लिए क्रांति जी अवतार नहीं लेंगी। यह वाकई दुखद है।
शोकाकुल
घनश्याम सिंह ओड़ींट