How to be a Film Director?

बॉलीवुड में निर्देशक भी दो तरह के होते हैं, अर्थात् निर्देशक बनने के दो प्रोसेस होते हैं-

1. जिनके नजदीक या दूर का कोई लिंक या रिश्तेदार बॉलीवुड में काम कर रहा होता है। जिससे ग्लैमर की कहानियां सुनकर और मीडिया में गॉसिप्स पढकर उनकी भी इच्छा होती है इस कथित ग्लैमरस चमकीली इंडस्ट्री का हिस्सा बनने की, बॉलीवुड में काम करने की। काम करने की मतलब एक्टिंग करने की। फिर ये कोशिश करते हैं एक्टर बनने की और ना बन पाने पर आखिरकार उन्हें अपने रूम पार्टनर या अन्य फेलियर द्वारा सलाह मिलती है किसी भी तरह एक बार कहीं भी घुस जाने की। जिसका पालन करते हुए वो अपने लिंक से हाथाजोड़ी करके किसी डायरेक्टर के यहां फ्री वाले असिस्टेंट बनते हैं। फिर ये अगले 8-10-15-20 साल तक असिस्टेंट डायरेक्टर ही रहते हैं। इस दौरान इनकी कुछ साथ काम करने वाले स्टारों से दोस्ती हो जाती है या इनके साथ काम करने वालों में से कुछ स्टार बन जाते हैं। अब तक ये भूल चुके होते हैं कि वो यहां एक्टर बनने आए थे या समझ चुके होते हैं कि नहीं बन सकते। अब इनका टारगेट हो चुका होता है निर्देशक बनना। चूंकि फिल्म बनाने के लिए इनके पास स्टार होता है तो प्रॉड्यूसर आराम से मिल ही जाता है। आखिरी समस्या बचती है तो सिर्फ एकमात्र, कहानी की। जिसके लिए अगर भाईजान जैसा स्टार हो तो वो डीवीडी लाकर दे देता है, या तो फिर बंदा खुद ही एक दिन फुर्सत में साऊथ और हॉलीवुड की 15-20 डीवीडी लेकर बैठता है तो कहानी लिखकर ही उठता है। और इस प्रकार बनती है 100 करोड़ की फिल्म।
2. धरती की किसी कोने में एक ऐसा प्राणी होता है जिसके पास कुछ कहानियां होती हैं, अपने आस पास की, वो कहानियां उसे सोने नहीं देती चैन से, तंग करती हैं पर्दे पर उतरने के लिए, उसे लगता है कि ये कहानियां कही जानी चाहिए किसी भी कीमत पर। आखिर एक दिन वो हार जाता है उन कहानियों से और सबकुछ छोड़छाड़ कर निकल पड़ता है उन कहानियों को सजीव करने के लिए बॉलीवुड की ओर। लोगों से लिंक बनाता है यह जानने-समझने-सीखने के लिए कि यह किस तरह संभव है। एकाध साल में सीखता है कैसे भी करके। फिर जब उसे लगता है कि अब वो यह कर सकता है तो वो 8-10 साल इंतजार नहीं कर पाता किसी स्टार के लिए, शुरु कर देता है फिल्म बनाना अपना सबकुछ दांव पर लगाकर। स्टार नहीं होते, पैसे नहीं होते, टीम नहीं होती, कुछ भी नहीं होता हौसले के सिवा। कई बार फिल्म बन जाती है, कई बार नहीं भी बनती है। कई बार बन भी जाती है तो रिलीज नहीं होती। रिलीज भी होती हैं तो पब्लिसिटी की कमी की वजह से दर्शकों को पता नहीं चलता। अधिकतर पैसे खुद के होते हैं और अधिकतर वापस वसूल नहीं होते। लेकिन वो कहानियां जोरदार होती हैं, वो फिल्में देखने लायक होती हैं, भले ही 100 करोड़ी ना हों।

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