किस्सा
अमर कहानी होना चाहुं
अभी गुमनाम सा किस्सा हुं
दुनिया को मैं भीङ बताता
खुद उसी भीङ का हिस्सा हुं
कभी बर्बादी में भी हंस पङता
कभी खुशियों में भी परिशां हुं
अपनी ख़ताओं का खंडहर हुं
ना काबा हुं ना कलीसा हुं
अमर कहानी होना चाहुं
अभी गुमनाम सा किस्सा हुं
दुनिया को मैं भीङ बताता
खुद उसी भीङ का हिस्सा हुं
कभी बर्बादी में भी हंस पङता
कभी खुशियों में भी परिशां हुं
अपनी ख़ताओं का खंडहर हुं
ना काबा हुं ना कलीसा हुं