मैं आजाद हुं
“मैं आजाद हुं।“
“ये क्या बात हुई पूरा देश तो आजाद है… हम सभी तो आजाद हैं?”
“क्या वाकई?”
“हां… हमें 15 अगस्त 1947 को ही आजादी मिल गई थी?”
“किससे?”
“अंग्रेजों से…”
“वो तो तुम्हारे दादाजी को मिली थी, मैं तो तुम्हारे आजाद होने की बात कर रहा हुं।“
“हां तो मुझे भी तो आजादी विरासत में मिली ना?”
“तुम्हें विरासत में आजादी नहीं बल्कि गुलामी मिली है लला…”
“पहेलियां बुझाना छोड़ो, अगर साबित कर सकते हो तो करो”
“साबित क्या करना है… बाकी को तो छोड़ो तुम तो अपने गुस्से के भी गुलाम हो… कल तुम फ़ेसबुक पर एक आदमी को गालियां क्यों बक रहे थे?”
“अरे वो संघी था… साला कांग्रेस के खिलाफ़ लिख रहा था इसलिए?”
“तो तुम कब से कांग्रेस के प्रवक्ता बना दिए गए हो?”
“प्रवक्ता की बात कहां से आ गई इसमें? कार्यकर्ता तो हैं ना… खानदानी कांग्रेसी हैं हम… मेरे दादाजी के टाइम से… कोई हमारी पार्टी पर कीचड़ उछाले तो हम चुप बैठे रहेंगे क्या?”
“फ़िर तुम आजाद कहां हुए? तुम तो पीढी दर पीढी बंधुआ मजदूर हो गए एक पार्टी के… जरूरी थोड़े है कि जो योग्यताएं देख कर तुम्हारे दादाजी ने अपनी पार्टी और नेता चुना था वो योग्यताएं उस नेता के पोते में भी हों।“
“नेता से हमें क्या करना है, नेता तो आते जाते रहते हैं… हमें सिर्फ़ हमारी पार्टी से मतलब है… पीढियों से सींचा है यार पार्टी को…”
“लेकिन पिछ्ली बार तो तुम पार्टी को छोड़कर अपनी जाति के निर्दलीय नेता के साथ चले गए थे…”
“देखो भाई, पार्टी अपनी जगह है लेकिन अपना सिद्धांत है… कुछ भी हो… लेकिन बोट (वोट) और बेटी हमेशा अपनी जात वाले को ही दो…”
“फ़िर तो तुम अपनी जात के भी गुलाम हुए… वोट में जात देखने का क्या तुक है? तुम अपना नेता चुन रहे हो या फ़ूफ़ा…?”
“देखो भईया… अपनी हद में रहो… घर तक ना ही पहुंचो तो बेहतर होगा… तुम्हारी जात वाले नहीं देते क्या जात देख कर?”
“देते हैं ना। मुकाबला बराबरी पर है, मैंने कब कहा कि वो तुमसे कम बेवकूफ़ हैं। अच्छा ये बताओ अगर तुम्हारे दादाजी बीजेपी के भक्त होते तो क्या तुम भी बीजेपी को वोट देते?”
“लगता है तुम बीजेपी से हो?”
“नहीं… मैं किसी भी पार्टी से नहीं हुं… मैं आजाद हुं। तुम सिर्फ़ मेरे सवाल का जवाब दो…”
“देखो ऐसा है यार… बीजेपी सिर्फ़ साम्प्रदायिकता फ़ैलाती है, करती कुछ है नहीं… अगर दम है तो राम मंदिर बना कर दिखा दे… जबान देता हुं अगली बार मेरा वोट पक्का”
“लेकिन मैंने तो कभी भी तुम्हें घर के बाजू वाले मंदिर में भी जाते हुए नहीं देखा… अयोध्या पूजा पाठ करने के लिए कैसे टाइम निकाल पाओगे?”
“सवाल मेरे जाने या नहीं जाने का है ही नहीं… दरअसल राम मंदिर हमारी आस्था का प्रतीक है, भगवान श्रीराम की जन्मभूमि है।“
“ये बात तो नेताओं ने तुम्हें पकड़ा दी और तुमने पकड़ ली… लेकिन क्या कभी सोचा है तुमने कि श्रीराम यह थोड़े ही चाहते होंगे कि तुम उनके नाम पर झगड़े करते फ़िरो, उन्होंने तो अपने भाई भरत के लिए सारा अयोध्या ही त्याग दिया था। तुम उनको मंदिर में कैद करना चाहते हो बस, दिल में नहीं।“
“तो तुम वहां मस्जिद बनाना चाहते हो?”
“नहीं, क्या जरुरी है कि वहां मंदिर-मस्जिद ही बने, पहले ही कम हैं क्या दुनिया में झगड़े करवाने के लिए?”
“अच्छा तो तुम नास्तिक हो?”
“ना ही मैं नास्तिक हुं और ना ही मैं आस्तिक… मैं आजाद हुं।“
“चलो ठीक है… अगर वहां मस्जिद नहीं बने तो फ़िर भले ही मंदिर भी ना बने… मंजूर है… कोई स्कूल, अस्पताल या पार्क बना दिया जाना चाहिए। लेकिन यार देश में गौहत्या पर तो तुरंत रोक लगनी चाहिए“
“अगर तुमने कभी पढने की जहमत उठाई हो तो चार्ल्स डार्विन का ‘Survival of fittest’ का सिद्धांत कहता है कि जो चीज उपयोगी होगी वही टिकेगी और जो अनुपयोगी होगी स्वत: लुप्त हो जाएगी। और ब्रह्मांड की प्रत्येक वस्तु पर यह नियम लागू होता है। यदि गाय उपयोगी होगी तो लोग अपने आप ही नहीं काटेंगे…”
“यही… बस यही प्रॉब्लम है तुम्हारी… चार अक्षर क्या पढ लिए शुरु हो गए ज्ञान झाड़ने… बेटा ये डार्विन-न्यूटन तो कल पैदा हुए हैं… आज जितना भी विज्ञान तुम देख रहे हो ना वो सब हमारे ॠषि मुनियों की देन है। आज जो आविष्कार हो रहे हैं ना… वो सब 5 हजार वर्ष पहले के हमारे ॠषि मुनियों के ज्ञान के आधार पर ही हो रहे हैं।“
“जब सारा ज्ञान तुम्हारे पास 5000 साल से पड़ा था तो तुमने क्यों नहीं कर लिए वो आविष्कार? कहां व्यस्त थे?”
“बेटा, मेरे सब्र की परीक्षा मत लो। अब तुम देश के अपमान पर उतर आए हो। शायद तुम्हें पता नहीं होगा हमारा देश विश्व गुरु रहा है हमेशा से। आज की सम्पूर्ण चिकित्सा पद्धति का आधार हमारे प्राचीन ग्रंथ ही हैं, जीरो का आविष्कार भी यहीं हुआ था और योग भी हमारी ही देन है।“
“लेकिन वो तो 5000 साल पहले ही हो गया ना… मैं तो बचपन से सुन-सुन कर अब बोर भी हो गया। आधुनिक काल में कोई तुमने आविष्कार किया हो तो बताओ या सिर्फ़ पांच हजार साल पहले पर गर्व करके ही काम चला रहे हो?”
“बातें घुमाना तो कोई तुमसे सीखे। तुम यार गाय की उपयोगिता से बात को विज्ञान पर ले गए।“
“चलो वही बता दो…”
“अब ये तो तुम्हें पता ही होगा कि गाय हमारी माता है… गाय की हर एक चीज उपयोगी होती है। कई शोध से प्रमाणित हो चुका है कि गाय का दूध और घी सबसे अधिक शुद्ध और पौष्टिक होते है। और तो और गौमूत्र में भी इतनी ऊर्जा होती है कि घड़ी चल सकती है और कैंसर का इलाज भी हो सकता है। गाय के गोबर और घी से हवन करने पर वातावरण भी शुद्ध हो जाता है। मतलब तुम ये समझ लो कि गाय का हर उत्पाद जीवनरक्षक है“
“ओह… तब तो हमें गाय जरुर बचानी चाहिए… मैं तो कहता हुं हर व्यक्ति को अपने घर में कम से कम एक गाय तो पालनी चाहिए। by the way, तुम्हारे घर में कितनी गायें हैं?”
“पहचान लिए हम तुमको… मुसलमान हो ना तुम?”
“नहीं तो… ना मैं हिंदू हुं और ना ही मुसलमान… मैं आजाद हुं।“
“तो फ़िर तुम गाय को काटने का समर्थन क्यों कर रहे हो?”
“मैं कहां समर्थन कर रहा हुं, मैं तो किसी भी जीव को मारने का समर्थन नहीं करता।“
“तो फ़िर तुम विरोध क्यों नहीं करते?”
“मैंने कहा ना… मैं आजाद हुं।“
“फ़िर भी तुम अपना धर्म तो बताओ, कुछ पता चले तुम्हारा… हिंदू, मुस्लिम, सिख, बौद्ध, यहूदी या ईसाई?“
“इनमें से कोई धर्म नहीं है मेरा… मेरा अपना खुद का धर्म है”
“खुद का धर्म !!? खुद का धर्म भला कैसे हो सकता है, यदि तुम मुसलमान के घर पैदा हुए हो तो मुसलमान हो और यदि ईसाई के घर पैदा हुए हो तो ईसाई हो…”
“फ़िर तो तुम किसान के घर पैदा हुए हो तो किसान हुए, यहां सफ़ेद कोट पहन कर डॉक्टर बने क्यों बैठे हो क्लिनिक में?”
“धर्म जन्म आधारित होता है, व्यवसाय जन्म आधारित पहले होता था अब नहीं… मेरे पिताजी भले ही किसान थे लेकिन उन्होंने कैरियर चुनने में मुझे पूरी छूट दी और मैंने MBBS की पढाई कर अपना क्लिनिक शुरु किया”
“हां, ठीक इसी प्रकार मैंने अपने हिसाब से दुनिया को पढकर और अपने ईश्वर को चुन कर अपना धर्म शुरु किया है”
“हा हा हा… अच्छा तो क्या है तुम्हारा धर्म? हमें भी तो बताओ क्या पता हम भी ग्रहण कर लें”
“पहले तुम बताओ तुम्हारे हिसाब से धर्म क्या है?”
“हम्म्… धर्म वो जरिया है जो व्यक्ति को ईश्वर के नजदीक ले जाता है”
“अच्छा तुम्हारे क्लिनिक पर जो लोग आते हैं, उन सब के रोगों के लिए तुम सब को एक ही दवाई देते हो क्या?”
“सुबह सुबह सोमरस का पान करके आए हो क्या… एक ही दवाई से सभी रोगों को ठीक कर पाना कैसे सम्भव है?”
“वैसे ही जैसे एक ही धर्म से सभी को ईश्वर के नजदीक पहुंचाना…”
“कहना क्या चाहते हो?”
“यही कि जब लोग इतने हैं तो धर्म 5-7 ही क्यूं? और वो भी सारे के सारे आउटडेटेड, हजारों साल पुराने जिनकी एक्सपायरी डेट तक निकल चुकी है… देखो… हर इंसान अपने आप में अलग है, हर एक की परिस्थितियां अलग हैं और हर एक का ईश्वर अलग है तो फ़िर खुद के लिए रास्ता भी उसे स्वयं ढूंढना चाहिए ना, ईश्वर के नजदीक जाने के लिए… अपने लिए अपना स्वयं का धर्म बनाना चाहिए, उसके बेटे को अपने लिए अपना खुद का और पोते को अपना? धर्म हर इंसान और उसके भगवान के बीच का व्यक्तिगत मसला होना चाहिए, उसे इस तरह थोपा जाना और आनुवांशिक कर दिया जाना ही तो आज धर्म के नाम पर हो रहे रक्तपात की असली वजह है?”
“वो छोड़ो… तुम ये बताओ कि तुमने क्या धर्म बनाया है? कौनसा रास्ता ढूंढा है ईश्वर के नजदीक जाने के लिए?”
“अभी अभी तो मैंने कहा ना कि धर्म निजी मसला है। तुम मेरे धर्म को क्यों ओढना चाहते हो? मैंने अपना ढूंढ लिया है, तुम अपना ढूंढो…”
“फ़िर भी बता दो, क्या पता तुम्हारे तलाशे रास्ते से हम जैसों का भी भला हो जाए”
“नहीं हो सकता है, जब मंजिल अलग हैं तो रास्ता एक कैसे हो सकता है, शायद तुम्हारा और मेरा ईश्वर ही अलग अलग हो… हो सकता है कि मुझे किसी मूर्ति में ईश्वर नजर आता हो और तुम्हें अपने माता-पिता में, हो सकता है मेरी नजर में किसी से मुस्कुरा कर बात करना ही पुण्य हो और तुम्हारे लिए पंछियों को पानी पिलाना… हो सकता है कि मुझे लेखन में ही मोक्ष की अनुभूति होती हो और तुम्हें संभोग में, तो फ़िर प्राप्ति के लिए हमारे रास्ते अर्थात कर्म एक कैसे हो सकते हैं?”
“आह… आ गया ना आखिर अपनी औकात पर… शराब और संभोग के अलावा तुम्हें कुछ दिखाई ही नहीं देता… साले वामी… पकड़ा गया आखिर…”
“नहीं मैं वामी, कांगी, आपी, संघी, मार्क्सवादी, पूंजीवादी, समाजवादी, हिंदूवादी, इस्लामवादी, गांधीवादी, गोडसेवादी, अंबेडकरवादी कुछ भी नहीं हुं… दरअसल मुझे किसी भी ‘वाद’ के खूंटे से बंधना पसंद नहीं है… और यही मेरे इंसान होने की पहचान है।“
“तो फ़िर कौन हो तुम?”
“मैंने बताया तो था… मैं आजाद हुं… मैं सबकी लेता हुं।“
“फ़िर भी तुम्हारी कोई विचारधारा तो होगी?”
“बावळे यही राज तो तुझे इतने देर से समझाने की कोशिश कर रहा हुं कि मैंने किसी भी विचारधारा का चश्मा नहीं लगा रखा है इसीलिए तो मैं आजाद हुं।
“नहीं ऐसी कोई आजादी है ही नहीं… मैंने तो कभी नहीं सुना…”
“सुनोगे तब, जब पूर्वाग्रह से मुक्त हो कर कुछ पढोगे या सुनोगे।“
“दरअसल तुम सब विचारधाराओं के बीच कंन्फ़्यूज हो… इसलिए एक चुन नहीं पा रहे हो”
“तुम्हारे दृष्टिकोण से मैं कंन्फ़्यूज हुं लेकिन मेरे हिसाब से मैं निरपेक्ष हुं और मैं इस निरपेक्षता को एंजॉय करता हुं… तुम गुलाम हो विरासत में मिली अपनी विचारधारा के… और मैं… हा हा हा… मैं आजाद हुं“
(लेकिन सिर्फ़ आभासी दुनिया में… वास्तविक दुनिया में निकलते ही मुझे तुमसे ज्यादा बकैतियों को अंजाम देना पड़ता हैं)